Tuesday, September 14, 2010

रामायण के रहस्य (भाग दो)

मारीच सोने का मृग बना और राम का नाम लेते लेते पहुँच गया पंचवटी में ! सीता जी ने भगवान राम से कहा कि
"हे प्राण नाथ आप इस स्वर्ण मृग को मार कर इसकी सोने की छाल मेरे लिए लेते आइये ! राम मृग मारने चले गए, मृग ने मरने से पहले जोर से चिल्लाकर लक्ष्मण का नाम लिया ! अब सीता जी लक्ष्मण जी को भगवान् राम की मदद को भेज देती हैं ! इधर पीछे से रावण आता है और सीता जी का हरण कर ले जाता है ! रास्ते में जटायु ने रावण को रोकने की कोशीश की और रावण की तलवार से अपने पंख गँवा बैठा ! राम विलाप कर रहे हैं, पेड़ पौधे, पशु पक्षी से सीता जी का पता पूछते हैं ! लक्ष्मण जी भी भगवान् राम की हालत देखकर बहुत दुखी होते हैं ! उधर दूसरे रास्ते से भगवान् शंकर माँ सति के साथजा रहे थे ! भगवान् शंकर ने राम की तरफ देख कर सर झुका दिया ! यह देख कर सति जी ने शंकर जी से पूछ लिया "प्रभु आप तो देवों के भी देव हैं फिर एक वनवासी राजकुमार जो अपनी पत्नी के वियोग में आंसू बहाता हुआ चला जा रहा है आप उसी को सर झुका रहे हैं ? ये क्या रहस्य है" ? शंकर जी ने कहा " देवी ये साक्षात परमेश्वर हैं, राम के रूप में दुष्टों का नाश करने धरती पर अवतार लेकर आये हैं " ! ये बात सति जी को हजम नहीं हुई ! सोचने लगी "अगर ये परमेश्वर के अवतार हैं तो साधारण मनुष्य की तरह पत्नी के वियोग में दर दर क्यों भटक रहे हैं " ! शंकर जी से बोली "मैं परिक्षा लेकर देखूं "? शंकर जी का माथा ठनका ! सोचने लगे लगता है कुछ अनहोनी होने वाली है ! बोले, "जाओ परिक्षा लेकर जल्दी लौटना" ! सति ने सीता का भेष बनाया और जिस रास्ते से भगवान् राम आ रहे थे वहीं रास्ते में खडी हो गयी ! भगवान् राम ने उन्हें देख कर हाथ जोड़ कर कहा, "प्रणाम मातेश्वरी , बाबा भोले शंकर कहाँ हैं " ? सुनते ही लगा जैसे उनके सिर पर हजारों घड़े पानी के गिर गए हों ! वे भयभीत हो गयी, गला सुख गया, वे पसीना पसीना हो गयी ! अब वे जिधर भी नजर उठाती हैं राम सीता और लक्ष्मण ही नजर आते हैं ! इधर उधर और सब तरफ वही राम सीता और लक्ष्मण ! किसी तरह वापस अपने आश्रम में पहुँची ! शंकर जी के पूछने पर कि "परिक्षा ले ली, तसल्ली हो गयी" उनसे भी झूठ बोल गयी "हाँ मुझे आपकी बातों पर विशवास हो गया परीक्षा ले ने की आवश्यकता ही नहीं पडी "! शंकर जी ने ध्यान मग्न हो कर सब कुछ अपने चक्षुवों से देख लिया, कि सति सीता जी का भेष बनाकर उस रास्ते पर खडी हो गयी थी जिस रास्ते पर भगवान् जा रहे थे, तथा उसके बाद सति ने जो कुछ देखा वह सब कुछ उन्हें अपने ध्यान में दिखाई दिया कि " सति ने पर स्त्री का भेष बनाया और मुझ से झूठ बोला कि परिक्षा लेने की जरूरत नहीं पडी " ! अब शंकर जी सति से अलग अलग ही रहने लगे ! ज्यादा से ज्यादा समय वे ध्यानमग्न रहने लगे ! सति को भी अपनी गलती का अहसास हो गया था ! उन्हीं दिनों उनके पिता जी राजा दक्ष एक बहुत बड़ा यज्ञ करने जा रहे थे जिसमें उन्होंने सारे देवताओं को बुलाया था छोड़ कर महादेव जी के ! जब सति ने अपने पिता जी द्वारा किए गए यज्ञ में जाने की इच्छा जाहिर की तो पहले तो बिना बुलाने पर 'मान न मान मैं तेरा महिमान' बनकर जाना अपमान होने का अंदेशा है, शंकर जी ने जाने से मना कर दिया, लेकिन जब सति जिद करने लगी तो शंकर भगवान ने अपने एक ख़ास गण के साथ उन्हें विदा कर दिया ! जब सति अपने पिता जी के घर पहुँची वहां उनकी माँ के अलावा किसी ने भी उनसे ढंग से बात नहीं की, यहाँ तक राजा दक्ष ने भी ! द्वार पर उनके पति शंकर की प्रतिमा लगी थी द्वार पाल के रूप में ! सति को यह देख पडा कष्ट हुआ, अपने पति का अपमान उनसे बर्दास्त नहीं हुआ और उन्होंने भभकती हुई हवनकुंड की अग्नि में छलांग लगा दी ! सति के हवनकुंड में गिरते ही उनके साथ भगवान शंकर के गण ने वहां तोड़ फोड़ शुरू करदी ! यज्ञ की व्यवस्था तार तार हो गयी ! शंकर भगवान जी ने आकर बाकी रही सही कमी पूरी कर दी, यज्ञ में आने वालों को दंड दिया गया ! यज्ञ के ध्वंस होते ही राजा दक्ष भी परलोक सिधार गए ! शंकर जी ने सति के जले हुए शरीर को कंधे पर उठाते हुए पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण की परिक्रमा कर डाली ! इस तरह की परिक्रमा में कहीं सति की आँखे गिरी, कहीं सर गिरा कहीं हाथ गिरे, तो कहीं पाँव गिरे, इस तरह जहाँ जहाँ भी माँ सति के शरीर के अंग गिरे वहीं आज उनके नाम के मंदिर बने हुए हैं ! सति का दुबारा जन्म हुआ हिमालय के यहाँ पार्वती नाम से ! आज हम उन्हें श्रद्धा भक्ति से शिव-पारवती के नाम याद करते हैं और उनकी पूजा करते हैं !
सबरी को दर्शन
सबरी नाम की भीलनी अपने गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए, कही सालों से वियावान जंगल के एक आश्रम में भगवान राम का इंतज़ार कर रही थी ! वह रोज सबेरे ही उठ कर दूर तक झाडू लगाती थी, रास्ते के कंकण पत्थर हटाती थी, दूर रास्ते में आश्रम तक ताजे ताजे फूल बिछाती थी ! रोज ताजे ताजे मीठे बेर चख चख कर भगवान को भोग लगाने को इकट्ठा करती थी ! उसे पक्का भरोसा था की इस शरीर को त्यागने से पहले भगवान राम उसके आश्रम में जरूर आएँगे ! उसके गुरु ने स्वर्ग जाते हुए उससे कहा था और उसको अपने गुरु के वचनों पर पूरा भरोषा था ! और भगवान् राम आये, भगवान राम को देखकर वह अपनी सुध बुध भूल गयी, उसके चरण धोकर पहले सर चढ़ाया फिर उसे पिया ! बेर चख चख कर भगवान को खिला रही है और भगवान राम बड़े प्रेम से उन बेरों को खा रहे हैं ! ऋषि मुनि साधु सन्यासी जिन के चरण कमलों के दर्शन करने के लिए कही जन्म बीता देते हैं वही भगवान राम सबरी के झुठे बेर बड़े प्रेम से खा रहे हैं, "भगवान से सच्ची श्रद्धा और भक्ती का फल" ! सबरी प्रेम में विह्वल होकर झुठे बेर कभी राम को खिलाती हैं कभी लक्ष्मण जी को देती हैं, लेकिन जहां राम उन बेरों को प्रेम से खा रहे हैं वहीं लक्ष्मण जी उन बेरों को उत्तर दिशा में फेंक देते हैं !
आने वाले दिनों में वही बेर के फेंके हुए दाने संजीवनी बूटी बनकर लक्षमण जी के प्राणों की रक्षा करते हैं ! भगवान राम के दर्शन के लिए ही सबरी आज तक जिन्दा थी, उनके दर्शन के बाद उनके सामने ही वह उनका नाम लेते हुए राम के धाम को चली गयी ! (तीसरे भाग में जारी )

Monday, September 13, 2010

रामायण के रहस्य

भगवान राम लक्षमण जानकी माँ पंचवटी में अपनी पर्ण कुटी बना कर रह रहे थे ! सुर्पंखां आई नाक कटवा कर चली गयी ! अपने भाई खर दूषण के पास गयी दोनों को सेना सहित राम के हाथों स्वर्ग पहुंचा गयी ! जब खर दूषण मारे गए, तो एक दिन जब लक्षमण जंगल में लकड़ी लेने गए थे भगवान राम चन्द्र जी ने सीता जी से कहा, "प्रिये अब मैं अपनी लीला शुरू करने जा रहा हूँ ! खर दूषण मारे गए, सूर्पनखां जब यह समाचार लेकर लंका जाएगी तो रावण आमने सामने की लड़ाई तो नहीं करेगा बल्की कोई न कोई चाल खेलेगा और मुझे अब दुष्टों को मारने के लिए लीला करनी है ! जब तक मैं पूरे राक्षसों को इस धरती से नहीं मिटा देता तब तक तुम अग्नि की सुरक्षा में रहो" ! भगवान् रामचंद्र जी ने उसी समय अग्नि प्रज्वलित की और सीता जी भगवान जी की आज्ञा लेकर अग्नि में प्रवेश कर गयी ! सीता माता जी के स्थान पर ब्रह्मा जी ने सीता जी के प्रतिबिम्ब को ही सीता जी बनाकर उनके स्थान पर बिठा दिया ! लक्षमण जी को इस लीला का पता भी नहीं चला !
आदो राम तपो वनादी गमनं, हत्वा मृगा कांचनम,
वैदेही हरणं जटायू मरणं, सुग्रीब संभाषणं,
बाली निर्दलम समुद्र तरणं, लंकापुरी दहनं,
पश्चात रावण कुम्भकरण हननम एदपि रामायणम !!
वहां लंका में सुर्पंखां ने रावण को सब कुछ बता दिया, की किस तरह राम लक्ष्मण सीता पंचवटी में रहते हैं, कैसे लक्ष्मण ने उसकी नाक काटी और किस तरहसे राम ने खर दूषण का वध कर दिया ! खर दूषण वध हो गया राम के द्वारा सुनकर रावण चौकना हो गया ! वह बहुत बड़ा विद्वान है, ८४ भाषाओं का ज्ञाता है ! वह मन ही मन सोचता है "खर दूषण मोही सम बलवंता, उन्हें मार सके न बिन भगवंता", "यानी की बिना भगवान के खर दूषण को कोई नहीं मार सकता, इसका मतलब राम के रूप में साक्षात भगवान इस धरती पर अवतार ले चुके हैं ! अब अगर मैं उनकी शरण में जाता हूँ तो मेरा कल्याण नहीं होगा ! वे अपने भगतों को नहीं मारते और मेरे पापों का प्राश्चित नहीं हो पाएगा ! अब मेरे पाप सबसे सरल रास्ता है की मैं उनसे बैर करूँ, उनकी भार्या सीता का हरण करूं और लड़ाई करते हुए उनके हाथों मरकर पूरे राक्षस जाति का उधार करूँ ! " ताड़का एक बड़ी दुष्ट राक्षसणी थी, उसके दो पुत्र थे, मारीच और सुबाहू ! ताड़का और सुबाहू को तो भगवान राम ने ऋषि विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा करते हुए मार गिराया था और मारीच को अपने बाण की शक्ती से उड़ा कर रावण की लंका में पहुंचा दिया था ! अब मारीच काफी बुढा हो चुका था लेकिन अपने माया जाल से रूप बदलने में माहिर था ! रावण को उसकी याद आई और उसे सोने का मृग बनकर पंचवटी जाने का आदेश दिया ! मार्च को अपनी मृत्यु सामने नजर आने लगी, सोचा अगर सोने का मृग बनकर पंचवटी नहीं गया तो ये दुष्ट राक्षस मुझे मार डालेगा, पंचवटी जाने से राम के वाणों से बच नहीं पाउँगा ! 'क्यों न श्री रामचन्द्र के वाणों से मर कर मोक्ष को प्राप्त करूँ '! वह तैयार हो गया !
सीता जी कौन थी ?
सीता जी लक्ष्मी जी के अवतार हैं और जब भी परमेश्वर अवतार लेकर धरती पर आते हैं तो लक्ष्मी जी उनकी शक्ती बनकर उनके साथ ही धरती पर अवतरित होती हैं ! ग्रन्थ कहते हैं कि एक बार रावण ने धरती के सारे ऋषि मुनियों पर उसके राज्य की सीमा के अन्दर रहने और उसकी पूजा न करके भगवान की पूजा करने वालों पर टैक्श लगा दिया ! इन तपस्विओं के पास देने के लिए कुछ नहीं था तो रावण की आज्ञा से उसके सैनिकों ने हर ऋषि मुनि से उसकी अंगुली काट कर रक्त के रूप में कर वसूल किया ! इस तरह रक्त से एक घडा भर गया ! वह घडा राजा जनक के राज्य की सीमा के अन्दर गाड़ा गया ! एक बार राजा जनक के राज्य में अकाल पड़ गया, वारीष नहीं हुई, चारों और हाहाकार मच गया, लोग भूखों मरने लगे ! राजा जनक बहुत चिंतित हुए, उन्होंने राज्य के विद्वानों, ज्ञानी, ऋषि मुनियों और कुल पुरोहित को बुलाकर उनसे इस अकाल से छुटकारा पाने का उपाय पूछा ! जाने माने विद्वाओं ने राजा जनक को जबाब दिया कि "जब महाराजा जनक स्वयं अपने राज्य की सीमा के अन्दर हल लगाएंगे तभी बारीष होगी और देश वासियों को इस भीषण अकाल से छुटकारा मिल पाएगा "! कहते हैं राजा जनक ने जैसे ही हल लगाना शुरू किया तो पहले ही सीं (हल के फल से चीरी हुई लाइन) पर हल के फल से कोई वस्तु टकराई ! उन्होंने हल खडा करके अपने सैनिकों से उस स्थान की खुदाई करवाई ! खदाई में एक घडा निकला और घड़े के अन्दर एक नन्नी सी बच्ची निकली, आगे चलाकर यही भगवान राम की भार्या सीता हुई ! इस तरह सीता जी को रावण की पुत्री भी कहा जाता है ! बाकी दूसरे भाग में

बादल

बैठकर पर्वत शिखर पर,
देखता हूँ बादलों को,
फिरते हैं आवारा बन कर,
हैं डराते बिजली गिराकर,
या वारीश की बुँदे लिए,
आशा का एक दीप दिखाकर !
जब चाहें जिधर जांय,
जैसा चाहे रूप बनाय,
पहुँच जाएंगे अरब ईरान,
या फिर रूस चीन जापान,
राष्ट्रपति भवन आ जाते,
सुरक्षा दल कुछ कह न पाते !
ताजमहल को ढक लेंगे,
जब शाहजहाँ इधर नजर करेंगे !
इन्हें वीजा न पास पोर्ट चाहिए,
दर दर भटकते इन्हें पाइए !
रोक नहीं टोक नहीं,
है हकीकत जोक नहीं !
सिकंदर ने देश जीते,
हिटलर के दिन बीते,
ये इनसे भी डरके ना भागे,
सदा रहे इनसे भी आगे !
पूरे गगन पर राज है इनका,
कल भी था और आज भी इनका !
जिस देश ने गुस्सा दिलाया,
गर्मी ने उसको जलाया,
फिर इतनी वारीष आई,
बाढ़ ने तवाही मचाई !
पर बादल भी खुश नहीं हैं,
इनका अपने पर बस नहीं है !
जब होता आंधी का जोर,
भागे बादल मचाके शोर !

Sunday, September 12, 2010

भूली बिसरी यादें

सन १९७० ई० में मेरी यूनिट मिजोराम में थी ! सब कम्पनियां अलग अलग थी, बटालियन मुख्यालय सेलिंग एक पहाडी के ऊपर था ! जहां पर हमारा मुख्यालय था वह कुदरती पहाडी के ऊपर समतल मैदान जैसा बना था ! यह तीन तरफ से जंगल से ढका था और इसके दक्षिण में उठती हुई पहाडी थी, जिसकी चोटी पर एक गाँव था जिसका नाम था थिनसुथलियां ! हमारी यूनिट की एक कंपनी इसी गाँव में रहती थी ! यहाँ की एक विशेषता थी कि सरकार ने इस प्रदेश के सारे लोगों को पहाड़ों की चोटियों से उतार कर ऐसे गाँव बसाए जो सडकों के किनारें हों, तथा सारे गावों में १२ वीं तक की स्कूल/कालेज, क्लीनिक जहाँ हर समय डा० नर्श और दवाइयों की व्यवस्था हो ! खेल के मैदान ! यहाँ के लोग सारे ईसाई हैं इस तरह हर गाँव में एक एक चर्च भी हैं जहां सारे लोग जवान, बच्चे और बूढ़े हर इतवार को प्रार्थना करने इकट्ठे होते हैं ! काम धंधों के मामले में यहाँ के लोग कुछ कृषि करते हैं और बाकी दुकानदारी, मजदूरी, पुलिस, सेना और अन्य महकमों में नौकरी करते हैं ! यहाँ के लोग मिलनसार और ईमानदार हैं लेकिन जिस किसी ने भी इनके साथ दुश्मनी मोल ले ली तो ये लोग उसे नहीं छोड़ते हैं ! कद काठी में मजबूत और दिलेर हैं ! यहाँ उन दिनों लडकियां ज्यादा थी, लडके कम थे ! लड़कियां बाहर वालों से भी शादी कर लेंगी लेकिन शर्त यह है कि उसे यहीं इन लोगों के बीच रहना पडेगा ! लडके को कप्पी और लडके को कप्पू कहते हैं ! जंगल बहुत घने हैं और इन जंगलों में जीवन दायिनी जडी बूटियों के अलावा जहरीले बेलें भी होती हैं ! इसकी जानकारी देने के लिए यहाँ आने वाली हर सेना की बटालियन के लोगों को एक महीने की जंगल के पेड़ पौधे, पानी की शुद्धता की जांच करने की ट्रेनिंग दी जाती है ! हमारी यूनिट के पूर्व में उतरती हुई पहाडी एक पहाडी नदी की तरफ उतरती थी, और पश्चिम दिशा में प्रदेश की राज धानी आइजोल था ! पानी के चश्मे बहुत सारे हैं लेकिन पीने लायक बहुत कम सोत हैं ! यही कारण है कि यहाँ आकर ज्यादातर जवान पेट के मरीज बन जाते हैं ! वैसे कुदरती सुंदरता बिखरी है चारों ओर ! खाने पीने के मामले में ये लोग मांसहारी हैं और सांप तक भी खा जाते हैं !
यहाँ की एक विशेषता और है कि यहाँ सारा इलाका पहाडी है और इन सपाट पहाड़ों में लोग धान की खेती करते हैं ! यहाँ एक प्रकार का जंगली केला भी होता है जिसका फल छोटी अंगुली के भी आधे के बराबर होता है लेकिन मिठास, एक बार एक केला खा लिया तो ६, ७ घंटे तक इसकी मिठास मुंह में बनी रहेगी !
ऐसे स्थान में तीन साल का समय बिताना बहुत मुश्किल होता है, वशर्ते आपकी एक अच्छी कंपनी न हो ! तो जब हम यहाँ आए तो हमने चार लोगों की एक टीम बनाई जिनकी विचारधाराएं, खान पान, रहन सहन आदतें मेल खा रही थी ! वैसे भी जब आप सेना का अंग बन गए हैं तो समय को एक यादगार बनाने के लिए अपनी कुछ इच्छाओं को भी त्यागना पड़ता है ! कुछ हद तक फ्लेक्षबिलिटी जरूरी है जिन्दगी को मजे से जीने के लिए ! तो हमारी टीम में मैं राजपूत, एक रहीम खान मुसलमान (मुंबई का), एक सरदार हरभजनसिंह और एक ईसाई था नाम था टॉम ! हम चारों शाम को चार या पांच बजे सड़क के साथ साथ कभी उत्तर, कभी दक्षिण दिशा को तो कभी पूर्व तो कभी पश्चिम दिशा में सैर को निकल पड़ते थे ! रहीम खान पेंटर था साथ ही बिना स्कूली शिक्षा लिए वह एक कुदरती आर्टिस्ट कलाकार भी था ! उसकी खूबी थी कि वह चाय पीते पीते सामने वाली की फोटो बना देता था ! उसने एक जंगल का शीन तैयार किया था जहां एक सूखा पेड़ टहनियों के साथ दिखाया गया था, उसके साथ छोटी छोटी झाड़ियाँ, दूरी पर दो तीन हिरन कान खड़े किये हुए और उस पेड़ पर बैठी तीन चार चिड़ियाँ ! यह शीन
इतना आकर्षक बना कि यूनिट के आफिसर्स म्यस, ब्रिगेड मुख्यालय में भी इस शीन को लगाया गया ! एक बार रहीम खान थिनसुथलिया गाँव में चाय पी रहा था ! यहाँ दुकानों में ज्यादातर जवान लड़कियां ही बैठती हैं ! चाय देने वाली भी एक लड़की ही थी, रहीम खान ने चाय पीते पीते एक छोटे से कागज़ पर उस सुन्दर लड़की की तस्वीर बना डाली ! तस्वीर देखकर लड़की ने रहीम खान से चाय के पैसे पच्चीस पैसे तो लिए लेकिन उस समय के पांच रुपये का मुर्गा मुफ्त में दे दिया जिसे हम चारों ने मिल बाँट कर खाया ! सरदार हरभजनसिंह की बात भी न्यारी थी, यूनिट के सब जाट, राजपूत, मुसलमान उससे पंगा लेते थे और उससे प्यारी प्यारी पंजाबी में गाली खाते थे ! सब एक तरफ हो जाते और अकेला सरदार हरभजनसिंह एक लाख के बराबर पड़ता था उन लोगों पर ! न कोई उसकी गालियों को बुरा मानता न हरभजनसिंह ही किसी के मजाक को सीरियस लेता ! उसी तरह टाम जोक सुनाया करता था और खूब हंसाया करता था ! और मैं रोज एक व्यंग कविता बना कर सुनाता था और सबका मनोरंजन करता था ! ये हमारी यारी तब तक जिन्दा रही जब तक हम मिलोराम में रहे ! मिजोराम से निकलते ही हम लोगों की भी अलग अलग जगहों पर पोस्टिंग हो गयी और हम बिछुड़ गए फिर कभी दुबारा नहीं मिल पाए !

Friday, September 10, 2010

मेरी कहानी (इकतीसवां भाग)

जिन्दगी की गाडी चलाती जा रही थी, बीच बीच में स्टेशन आते रहे कोइ छोटे छोटे तो कोइ बड़े बड़े जहां न चाहते हुए भी गाडी रुक जाती थी बिना किसी वजह के, बड़ी बोरियत होती थी इस बेवजह रुकने पर, क्यों की जिन्दगी चलने का नाम है ! चलते ही चलो ! गांधी जी का भी एक नारा था कि ' अगर कोई नहीं है साथ में तो इकला चलो पर चलो' ! १९५६ ई० में जहरीखाल (पौड़ी गढ़वाल) गया हुआ था १२ वीं की परीक्षा देने, उन्हीं दिनों लैंसीडाउन में (गढ़वाल राईफल्स का रेगिमेंटल सेंटर) उस जमाने के एक मात्र सिनेमा हाल में उस समय के मशहूर ऐक्टर, प्रोड्युजर, डाईरेक्टर राजकपूर साहेब की फिल्म चल रही थी "श्री चार सौ बीस " । उसका पहला ही गाना था
'मेरा जूता है जापानी, ये पैंट इंग्लिस्तानी सर पे लाल टोपी रूसी फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी !
चलना जीवन की कहानी रुकना मौत की निशानी, सर पे लाल टोपी रूसी फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी ' !
वैसे श्री चार सौ बीस के सारे ही गाने बड़े पौपुलर हुए थे, लेकिन यह गाना देश में ही नहीं विदेशों में भी अपनी अमिट छाप छोड़ गया है ! उस समय इस गाने के मतलब को नहीं समझ पाए थे, लेकिन समय के आंधी तूफानों से भिड़ते, लड़ते, गिरते, पड़ते आगे बढ़ते , एक शब्द, एक लाईन का मतलब समझ में आने लगा ! बचपन भाग रहा है जवानी की तरफ, जवानी भाग रही है अपनी मंजिल की ओर ! जो गिरते हुए भी उठ उठ कर फिर चल रहे हैं, क्यों गिरे थे, उससे कुछ शबक सिख कर बढ़ रहे हैं मंजिल की ओर, अटल विश्वास के साथ, वे जरूर पहुंचते हैं अपनी मंजिल पर ! लेकिन जो राह के बीच में ही रुक जाते हैं, हार जाते हैं, पीछे रह जाते हैं, पछताते हैं ! उस जमाने में वह निरी एक फिल्म थी, गरीब-अमीर की लड़ाई थी ! बड़ों के पास सब कुछ होते हुए भी वे गरीब को ही लूट रहे थे, फिर भी गरीब थे और गरीब लूटते थे फिर भी देते ही थे लेते नहीं थे !
ठीक इसी ट्यून पर एक स्वयंभू प्रोपर्टी डीलर ने किसी किसान की जमीन को बिना उसकी जानकारी के प्लाट काट काट कर सेल करने पर लगा दिया ! अपने पैसों से उसने पक्की सड़कें और नालियां बनाईं ! बड़ी संख्या में लोगों ने प्रीमियम की राशि उसे थमा दी और उसने एक १० रुपये के स्टाम्प्स पेपर पर रसीद बना बनाकर पकड़ा दी खरीददार को ! इस तरह ३० - ४० लाख की पूंजी जमा हो गयी ! जब रजिस्ट्री की बारी आई तो पता चला की ये सब तो एक फ्राड था ! लोगों ने उसकी पिटाई भी की ! पुलिस लाक अप में भी रहा ! लेकिन उसके नाम पर कुछ भी नहीं था ! केस बन नहीं सकता था क्योंकि कोर्ट में केश के सही पेपर की जरूरत पड़ती है, वह किसी के पास नहीं था ! लोग सर पीट रहे हैं और वह मूंछों पर ताव देता घूम रहा है लूटने वालों के घर के आगे से ! मैं भी आगया था इस सज्जन के भेष में दुर्र्जन के झांसे में ! मेरे भी डेढ़ लाख फंस गए थे ! मैंने किसी न किसी तरह से साम दाम दंड भेद से उससे इस राशि के चेक ले लिए जो बाद में बाउंस हो गए ! वकील अच्छा मिल गया, केस ४२० का लगा ! डेढ़ साल तो लगा पर मेरा पैसा मुझे मिल गया ! इस से एक नयी बात सीखने को मिली कि जहां आप मकान दुकान के लिए प्लाट खरीद रहे हैं, पहले पता कर लें कि वह जमीन किसान की ही है न कि पंचायत की जमीन है ! आज कल अफराधों में लिप्त कुछ प्रोपर्टी डीलर डी डी ए की जमीन भी बेच रहे हैं, इसका भी पता कर लें ! वह जमीन क़ानून के दायरे में तो नहीं आ रही है या पहले ही उस पर झगड़ा चल रहा हो ! पूरी जानकारी के बाद ही दिल्ली या दिल्ली के के बाहर शहर या कस्बों में प्लाट खरीदें !

Wednesday, September 8, 2010

भगवान् अगर हैं तो कहाँ हैं ?

हमारे पुराण, निषद, वेद, रामायण, महाभारत, श्रीभागवत कथा, श्री गीता, ये सभी कहते हैं की "भगवान् हैं, सब जगह व्याप्त है, हर दिल में है " ! कोई कहता है की अगर भगवान सचमुच में है तो वह प्रकट क्यों नहीं होता ? कोई कहता है मैंने भगवान् को अपने अन्दर महसूश किया है ! अब इस बारे में एक छोटी सी कहानी पर ध्यान दें !
एक गुरु के चार चेले थे ! उन्हें वे आश्रम में विद्या का ज्ञान करा रहे थे ! ईश्वर चिंतन, ईश्वर की हजारों आँखें हैं और वे हर एक पर नजर रखते हैं ! जीवों के प्रति दया भाव, सच्च बोलना। अहिंसा, पवित्रता, आदि आदि विषयों की जानकारी दी जाती थी ! जब आश्रम के नियमों के अनुसार पढाई समाप्त हो गयी तो गुरु जी ने इन विद्यार्थियों की परिक्षा लेने की ठानी ! उन्होंने एक दिन प्रात: ही इन चारों चेलों को एक एक कबूतर दिए और कहा , "देखो तुमने ये कबूतर मारने हैं लेकिन ऐसी जगह पर मारने हैं जहां कोई नहीं देख रहा हो !" इन चेलों में से तीन चेलों ने तो कबूतर मार दिए, लेकिन चौथे ने नहीं मारा और वैसे ही जिन्दे कबूतर को लेकर वापिस गुरु जी के पास आ गया ! गुरु जी ने तीनों से प्रश्न किया की जब तुम कबूतर को मार रहे थे उस समय तुम्हे किसी ने नहीं देखा, तीनों ने ना में जबाब दिया ! जब गुरु जी ने चौथे से पूछा की क्या तुम्हे कोई ऐसी जगह नहीं मिली कि जहां तुम्हे कोई नहीं देख रहा हो ? चेला रोते हुए बोला, "गुरु जी मैं गुफा के अन्दर अँधेरे में गया, मकान के अन्दर गया, पेड़ की जड़ में सुरंग में भी गया जहाँ घुप्प अन्धेरा था लेकिन मुझे सब जगह लगा कि उस अँधेरे में भी मुझे दो आँखें घूर रही हैं ! "
गुरु ने कहा वही ईश्वर था और तुम ही सच्चे विद्यार्थी हो जिसने असली विद्या ग्रहण की ! तुमने साक्षात ईश्वर के दर्शन कर दिए ! भला जिन विद्यार्थियों को शिक्षा दी गयी हो 'अहिंसा परमो धर्मा' की वे ही कबूतर मार कर ले आएं तो वे तो नीरे मुर्ख के मुर्ख ही रहे ! भगवान् सब जगह हैं सारा जगत ईश्वर मयी है, वह सबको दर्शन देते हैं ठीक उसी रूप में जैसे इंसान की प्रवृति होती है ! जब राजा जनक के आँगन में सीता स्वयंबर के समय सारे देशों के राजा-महाराजा वहां बैठे थे, उनमें मनुष्य भी थे, सुर भी थे और असुर भी थे ! मनुष्य भगवान राम को देख रहे थे वे मनुष्यों में श्रेष्ठ मनुष्य लग रहेथे, देवताओं को देवताओं में सर्व श्रेष्ठ देवता लग रहे थे, लेकिन राक्षसों को साक्षात विराट रूप धरे महाकाल लग रहे थे ! जैसे इंसान की बुद्धी होगी वैसे ही ईश्वर का स्वरूप उसे नजर आएगा ! जिन्दगी में एक बार वह ईश्वर हर एक के दरवाजे पर दस्तखत देता है कभी साधू सन्यासी का रूप बनाकर कभी भिखारी बनकर, भाग्यवान ज्ञानी भक्त उन्हें पहिचान लेते हैं और दर्शनों का लाभ उठा लेते हैं ! जो भगवान् को नहीं मानते वे भी भगवान् का नाम ले लेते हैं चाहे यही कहते हैं कि "भगवान् नहीं है, कोरी कल्पना है" ! हो सकता है वे भी अपनी जगह सही हों !!

Tuesday, September 7, 2010

क्या आपने कभी अपने बारे में भी सोचा है ?

जिन्दगी की इस भाग दौड़ में कभी मौक़ा ही नहीं मिला, अपने बारे में सोचने का ! पता ही नहीं चला की कब बचपन आया, कब खुली हवा में पार्क में जाकर दौड़े भागे, गललियों में गिल्ली डंडा खेले, क्रिकेट की बॉल फेंक कर कितनों की खिड़की के शीशे फोड़े, कितने अंकलों की डाट डपट खाई होगी ! नाजुक कंधा बस्ता भारी के बोझ तले, टीचर के होम वर्क से बड़े हुए, स्कूल कालेज की मस्ती, विकास और मंहगाई की आंधी ने दिखाई हर एक को उसकी माली
हस्ती ! कालेज से निकलते ही नौकरी की तलाश ! शादी फिर बच्चे ! रात देर तक घर पहुंचना, फिर सुबह सबेरे जल्दी उठकर वही भाग दौड़, बच्चों को तैयार करके स्कूल भेजना, बस से नहीं तो स्वयं अपनी कार, मोटर साईकिल, साईकिल या फिर रिक्सा से ! खुद तैयार होकर आफिस के लिए निकलना ! रास्ता ठीक मिल गया तो बिलकुल समय पर दफ्तर में हाजिरी लग जाएगी और अगर जो अमूमन होता ही रहता है, किसी नेता ने जलूस निकाल लिया, कोइ मंत्री परिवार के साथ विदेश यात्रा पर जा रहा है, किसी ब्यूरो क्रिएट या नेता के लड़की या लडके की शादी है और पूरे रोड को सुबह से ही जाम कर दिया गया है, किसी धार्मिक संस्था ने झांकी निकाल ली और सड़क जाम करदी तो ऑफिस से गैरहाजिरी तो होगी ही, साथ ही अपने बॉस की घुड़की सुनने को मिलेगी वह अलग ! जहाँ मिंया बीबी दोनों ही सर्विस पर चले जाते हैं, उनको माई (मेड) चौबीस घंटे के लिए रखनी पड़ती है, ताकी जब बच्चे स्कूल से आएं तो उन्हें वह संभाल सके, अगर माई शरीफ मिल गयी जो आज के ज़माने में मिलनी मुश्किल ही नहीं असंभव भी है, तो आप दफ्तर में मन लगाकर काम कर सकेंगे नहीं तो मन तो घर पर रहेगा फिर जो भी काम करोगे गलत होगा और फिर बॉस की वह सब कुछ सुननी पड़ेगी जिसकी आपने कभी अपेक्षा भी नहीं की होगी ! अब आपके पास दो ही रास्ते बचते हैं या तो बॉस के मुंह पर खरी खोटी सुनाकर अपनी दिल की भड़ास मिटाकर रिजाइन कर दो या फिर निरी गाय बन कर चुप चाप उसकी सुनते रहो, मन ही मन मुस्कराते रहो, बॉस जब थक जाएगा अपने आप चुप हो जाएगा ! यारो वह भी पंच तत्व का इसी धरती का जीव है हमारी तरह ! रात को हारे थके घर आए, किसी रिश्तेदार के लडके का कार्ड आपका इंतज़ार करते मिलेगा ! जाना पडेगा पूरे परिवार के साथ बुलाया है, बच्चे तो खुश हैं लेकिन अगर रिश्तेदार आपकी ससुराल की तरफ का निकला तो बीबी भी खुश पर आपका मुंह लटक जाएगा ! अगर आपका रिश्तेदार निकला तो बी बी का मुंह सूजा सूजा लगेगा ! जेब तो दोनों तरफ से आपकी ही कटनी है और रात खराब होगी सो अलग ! दफ्तर में बोनस मिला, आपने कही दिन पहले ही इस बोनस की राशि का सही सदुपयोग करने की योजना बनाई थी, उसी दिन बच्चों के बैग में होम वर्क की डायरी में स्कूल का एक अतिआवश्यक नोटिस मिला, लिखा था, "इस महीने की पहली तारीख से हर बच्चे की फीस में ५० फी सड़ी इजाफा किया गया है, बिना किसी हो हल्ला के जमा करा दें नहीं तो अपने बच्चे के लिए कोई और स्कूल ढूंढ लें" ! इसी तरह जिन्दगी के नरम गरम थपेड़ों को झेलते हुए समय कब निकल गया, पता भी नहीं चला और ६० साल की उम्र होते ही आपका रिटायरमेंट का दिन आ गया ! शरीर थका थका सा है, लगता है आप ७० पार कर गए हैं !
अब पीछे झाँक कर देखिये इन साठ सालों में आपने इस शरीर को पुष्ट करने में कितना दिन या महीना लगाया ! शरीर अब थक गया है, कही रोग शरीर में अड्डा जमा चुके हैं ! हर दिन डाक्टर की क्लीनिक में जाना पड़ता है, वह भी हैरान है की इतने सारे रोग, इलाज करूं तो शुरू कहाँ से करूं ? फिर वह कोई न कोई गोली देकर पीछा छुड़ा देता है, आपको आराम आ रहा है या नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं है !
आपकी पड़ोस में जो सज्जन रहते हैं, वे पहले सेना में थे, २० साल की सर्विस होते ही ३८ साल में उन्हें रिटायर कर दिया गया था ! बड़ी भाग दौड़ की एक क्लास फॉर की सर्विस मिली ! उसको भी बच्चों को पढ़ाना था, पेंशन भी कम थी, जो अब वेतन भता मिल रहा था वह भी कम था, उन्हें भी रिश्तेदारियों में शादी-विवाह, जन्म दिन या अन्य समारोहों में भाग लेने जाना पड़ता था ! लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी ! सूरज उदय होने से पहले ये दोनों मिया बीबी उठते, हाथ देखते यह मन्त्र पढ़ते हुए, "कराग्रे लक्ष्मी बसती, कर मध्ये सरस्वती, कर मूले स्थितो बष्णु प्रभाते कर दर्शने" ! दैनिक क्रियाओं से रुक्सत होकर आधा घंटा व्यायाम - योगा करते, एक मील की सैर करके आते, तरो ताजा होकर बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करते, उन्हें स्कूल भेज कर स्वयं भी आफिस ड्यूटी पर चला जाता ! हर किसी से हंस कर बातें करता ! वक्त बेवक्त हर किसी की मदद को हमेशा आगे रहता ! बीबी घर में पास पड़ोस के बच्चों को इकट्ठा करके उन्हें बच्चों के खेल खिलाती, उनका मंनोरंजन करती ! छुट्टी के दिन महिलाओं को दश्कारी की ट्रेनिंग देती जो उसने अपने पति के साथ फ़ौज में रहते हुए सीखी थी ! इस तरह दोनों मियाँ बीबी मिल जुलकर गृहस्थी की गाडी को बिना किसी परेशानी के आगे खींचते चले गए ! आज उनके बच्चे भी स्वस्थ हैं बड़े हो गए हैं, और नौकरी करके माँ बाप का सहारा बन गए हैं ! अब ये सज्जन भी रिटायर हो गए हैं, पर चहरे पर वहीं चिरपरिचित मुस्कान, वही ताजगी, वही फूर्ती, कोई रोग नहीं, ६० पूरे हो चुके हैं लेकिन पचास के लगते हैं ! कारण समय की पावंदी, जल्दी सोना, जल्दी उठना ! सूरज के उदय होने से पहले की लालिमा के दर्शन करना ! अनुशासन, व्यायाम-योग नियमित तौर पर बिना नागा के करना ! वे इस युक्ती पर विश्वास करते हैं की पहले शरीर को थकाओ और फिर आराम करो, मजा आएगा ! वे कालोनी में काफी लोक प्रिय हैं ! कालोनी के हर राग रंग में हमेशा आगे रहते हैं ! क्या यह सब फ़ौजी ट्रेनिंग का कमाल है या कुछ और ? उनका कहना था आप अगर केवल आधा घंटा भी रोज इस शरीर को पुष्ट करने में लगाएंगे तो महीने में १५ घंटे ही लगे और साल में १८० घंटे, यानी ज्यादा से ज्यादा ८ दिन ! क्या जिस शरीर से आपने जिन्दगी की इतनी भारी गाडी खींचनी है, उसके इंजन में आप ८ दिन का ग्रीसिलिन भी नहीं लगा सकते ? बस केवल ८ दिन और जिन्दगी भर की मुस्कान !