Tuesday, March 2, 2010

ऐसी होली मनाई मैंने

इस साल होली पहली मार्च को पडी । गुलाबी सर्दी लेकिन ज्यों ज्यों दिनकर अपनी किरणों को फैलाता हुआ नील गगन के सीने पर अपने रथ को तेजी से बढाते हुए आगे बढ़ता गया, त्यों त्यों गर्मी का प्रभाव भी तेज होता चला गया। हम लोग अपनी सोसायटी में ही होली मनाया करते हैं, और हर साल की तरह इस साल भी भांग की ठंडाई के साथ भांग के गर्म गर्म पकोड़े । वैसे ही होली के रंगों का सरूर, फिर भांग की ठंडाई का भरा गिलास, एक नहीं दो नहीं पांच-पांच छ: छ:, ऊपर से भांग के पकोड़े, स्वाद स्वाद में कितने खा गए, हिसाब लगाने वाला भी जमीन पर पडा पडा हँसे जा रहा था। उसे देख देख कर और भी हँसे रहे थे । लेकिन हम ठहरे फ़ौजी, जल्दी किसी के हाथ आने वाले नहीं थे । हम नियमित तौर पर लम्बा समय लेते हुए, भांग की ठंडाई तथा भांग के पकोड़ों का लुफ्त ले रहे थे, धीरे धीरे। यार दोस्त आर के जैन जैसे सदा बाहर चहरे पर मुस्कान ओढे कमर को लचकाते हुए, विभिन्न मुद्राओं में डांस दिखाते हुए, जो होश में थे उनका मनोरंजन कर रहे थे । नशा तो नशा होता है, उसे नहीं पता की कौन फ़ौजी है और कौन फ़ौज नहीं है । वह तो मान न मान मैं तेरा महिमान बन कर सर पर चढ़ कर आदेश देना शुरू कर देता है, और मेरे साथ भी ठीक वैसी ही हुआ। मैं इस भांग के नशे को अपने पर हाभी नहीं होने देना चाहता था, इसलिए जल्दी ही पार्क से घर गया, नहाया धोया, कपडे बदले, और खाना खाने के लिए डिनर टेबल पर बैठ गया । प्लेट में सभी किस्म की खाद्य सामग्री रखी हुई थी। कड़ी थी, चावल थे, रायता था, मखनी दाल, छोले भटोरे, सलाद, चमच से खाना शुरू किया, जैसे जैसे प्लेट खाली होती जा रही थी, वैसे वैसे भांग अपना प्रभाव दिखाने लगा। पल में मैं मैट्रो की सवारी करने लगता, फिर अचानक हवाई जहाज में उड़ने लगता। फिर सोचता कहीं मैं
खाते खाते वेहोश न हो जाऊं, अगर ऐसा होगया तो सोसायटी में जो इज्जत अर्जित कर रखी है वो मिट्टी में न मिल जाय । यह सोच कर फिर प्लेट हाथ में लेकर चहल कदमी करने लगता । अब आलम यह था की मुझे चलते चलते स्वप्न आने लगे । मिनटों में मैं इंद्र के अखाड़े में पहुँच जाता, अपने को अफसराओं के बीच पाता। पलक झपकते ही साधुओं की टोली में जाकर भांग की चिलम पीता । फिर ख्याल आता की मैं बेहोश तो नहीं हो रहा हूँ। कहीं प्लेट हाथ से न छूट जाय। फिर शिव जी के गण अजीब अजीब वेश भूषा में नजर आये, वे सब के सब मेरा हाथ पकड़ कर मुझे नचाने लगे। अगले ही क्षण मैं विश्वामित्र बना हुआ हूँ, योग साधना में बैठा हूँ, कामदेव की फ़ौज वसंत ऋतू के साथ, धरती पर उतर रहे हैं। कामदेव ने अपने पुष्प धनुष पर काम वाण चढ़ाया और मेरे सीने पर चला दिया और ........ मेरी आँखे खुल गयी, कामदेव अपनी सेना के साथ डर कर भाग गए । मैंने फिर अपने को जोर से झटका दिया और चेतन अवस्था में आया । सोचा अब घर की तरफ भागो, कहीं भंग ने पूरी तरह से अपने आगोश में ले लिया तो मेरी इज्जत रूपी पूंजी का क्या होगा ? जल्दी जल्दी प्लेट खाली की, (मैं कभी खाने को बरबाद नहींकरता )। दो रस गुल्ले खाए और घर तरफ चल पड़ा । लिफ्ट के पास आकर बटन दबा दिया, लिफ्ट भी खुल गयी, लेकिन जैसे ही लिफ्ट के अन्दर जाने लगा, सोचने लगा की कहीं लिफ्ट में ही बेहोश हो गया तो फिर क्या होगा ? लिफ्ट से बाहर आकर सीढ़ियों से अपने घर पर आया । स्वप्न भी आ रहे हैं और सजग भी हो रहा हूँ ।
अजीब सी कसम कस । लुफ्त भी आरहा है और फिर बेहोश होने का डर भी सता रहा है । हंस रहा हूँ लेकिन दूसरों की प्रतिक्रया भी भांप रहा हूँ । नशा भी है लेकिन अपनी इज्जत का भी ख्याल है ।

2 comments:

  1. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

    ReplyDelete