Tuesday, August 31, 2010

मेरी कहानी (तीसवाँ भाग)





इस साल जौलाय के महीने आते आते तबियत कुछ खराब हो गयी थी, कारण दो तीन चक्कर अपने गाँव के लगाने पड़े ! गाँव जाने के लिए आज भी चढ़ाई उतराई करनी पड़ती है ! इस बार पत्नी अकेले ही अमेरिका गयी जौलाय के महीने में ! अगस्त में करण के एडमिशन के लिए उर्वशी (मेरी बिटिया ) करण को साथ लेकर अमेरिका गयी और एक महीना अपने भय्या के पास रहकर वापिस इंडिया आ गयी ! करण ने डिग्री कोर्स करने के लिए अमेरिका के कालेज में ही एडमिशन ले लिया है !

केदार नाथ बद्री नाथ यात्रा

केदार नाथ बद्री नाथ दोनों ही तीर्थ स्थान उत्तरा खंड में हिमालय की गोद में विश्व प्रसिद्द बहुत प्राचीन मंदिर हैं ! जहां केदार नाथ पुराणों में वर्णित मंदाकिनी नदी के तट पर बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है वहीं बद्री नाथ पवित्र पाविनी अलकनंदा के किनारे एक विशाल और बद्री नारायण का प्राचीन मंदिर है ! सेना में नौकरी करने के बावजूद भी अपने ही उत्तरा खंड के जग प्रसिद्द मंदिरों के दर्शन करने का अवसर नहीं मिला ! मंदिर के किवाड़ तो हर साल मई के महीने में खुल जाते हैं लेकिन एक तो भीड़ बहुत हो जाती है दूसरा मौसम कब बदली हो जाय, कब आंधी चल पड़े या बारीश हो जाय कहा नहीं जा सकता ! इसलिए इन स्थानों पर यात्रा करने का सबसे अच्छा सितम्बर-अक्टूबर का महीना रहता है !
केदारनाथ (ज्योतिर्लिंग)

अब के बच्चों के साथ पक्का मन बना लिया की बद्री धाम और केदार नाथ मंदिरों के दर्शन करने जरूर जाना है ! १९ सितम्बर को मैं ब्रिजेश-बिन्दू, आर्शिया और आर्नव को लेकर इस तीर्थ यात्रा पर निकल पड़े ! रात को कोटद्वार रहे, अगले दिन यानी २० सितम्बर को शोभा-जवानी, श्रे, जेठू जी (जगमोहनसिंह गुसाईं) दीदी टाटा सोमू से पौड़ी के लिए चल पड़े ! हमारे साथ राकेश नैथानी भी थे ! राकेश जी का गौरी कुंड में होटल है ! हमारे साथ सबसे नन्ना यात्री आरनव था, केवल सात महीने का ! जिले का मुख्यालय पौड़ी पहुंचे ! यह स्थान एक पहाडी की ढलान पर है ! बहुत ही रमणीक और आकर्षक है ! सामने उतर की ओर हिमालय की सफेद पहाड़ियां, नीचे, ऊपर उठती हुई पर्वत श्रीखंलाएं, रंग विरंगे फूलों की घाटियाँ मन को मोह लेने वाली ! बरसात समाप्त हो चुका है, नदी नाले शुद्ध जल धारा के साथ बह रही हैं ! मौसम न ज्यादा गर्मी है न सर्दी, यात्रा के लिए बिलकुल उपयुक्त मौसम है ! श्रीनगर, रूद्र प्रयाग (मंदा किनी अलकनंदा का संगम), तिलवाड़ा , अगस्तमुनी, गुप्तकाशी (पुराणों के मुताबिक़ पांडवों द्वारा गुरु ह्त्या और स्व गोत्र ह्त्या के कारण भगवान शंकर पांडवों से रूष्ट होकर इसी स्थान पर गुप्त हुए थे) ! यहाँ पर शंकर भगवान का मंदिर है, केदारनाथ के रईस पंडों के बंगले हैं, होटल हैं, सजा सजाया बाजार है ! पहाडी की गोद में बसा बड़ा ही सुन्दर स्थान है गुप्त काशी ! चारों ओर हरे भरे खेत, धान झंगोरा, मडुवा, उर्द और भी मौसम के फल उपलब्ध हैं ! चश्मे, झरने और पहाड़ियों से उतरती हुई नाले और नदियाँ उत्तराखंड की पहिचान है । फाटा होते हुए रात को गौरी कुंड पहुंचे ! रात यहीं होटल में रहे ! मंदाकिनी के किनारे बसा गौरी कुंड चारों ओर पहाड़ों से घिरा हुआ है, सर्दियों में यह स्थान भी बर्फ से ढक जाता है ! स्नान करने के लिए तप्त कुंड है, जहां यात्री सुबह सबेरे स्नान करते हैं ! यहाँ से केदारनाथ जाने का १४ मील पैदल रास्ता है ! घोड़े, पालकी, पिठू भी मिल जाते हैं ! जो पैदल नहीं जाना चाहते वे वापिस फाटा आकर हेलीकाफ्टर से केदारनाथ जाते हैं ! २१ तारीख को हम वापिस फाटा आये ! यहाँ पर सरकारी और निजी कंपनियों द्वारा भी हेलीकाफ्टर की सुविधा दी जाती है ! भीड़ बहुत थी फिर भी हर दश मिनट में एक हेलीकाफ्टर सवारी लेकर जा रहा था, जैसे ही हमारा नंबर आया, घाटी में धुंध आगई और हमारे हेलीकाफ्टर की उड़ान रद्द हो गयी ! एक रात फाटा में ही होटल में रहना पड़ा ! ठण्ड काफी थी स्नान के लिए गर्म पानी की जरूरत थी जो हमें एक बाल्टी २०-२५ रुपये में मिली ! यहाँ भी पांडे ही होटल, रेस्तरां और मार्केट पर अपना दबदबाव बनाए हुए हैं ! अगले दिन पहले ही फ्लेट से हम लोग केदारनाथ पहुँच गए ! यहाँ पर भी पांडे अपने अपने जजमानों को लेने के लिए हेलीपैड पर पहुँच जाते हैं ! आगे ये ही लोग गाईड करते हैं, जरूरी हुआ तो अपने जजमान को अपने ही धर्मशाला में ठहराएंगे, पूजा पाठ करवाएंगे, शिव जी के दर्शन भी वही कराते हैं ! पुराणों के अनुसार जब भगवान शंकर गुप्तकाशी में गुप्त हो गए तो पांडव उनके दर्शनों के लिए केदारनाथ पहुंचे, यहाँ भी वे बैल बनकर गुप्त होने जा रहे थे लेकिन भीम ने उनकी टाँगे पकड़ ली इस तरह शिव जी का धड से नीचे वाला हिस्सा यहीं रह गया और सिर नेपाल काठमांडू में जा निकला जहां पर आज विश्व विख्यात "पशुपति" मंदिर है ! केदारनाथ में यहीं पर यह विशाल मंदिर देश विदेश के लोगों का आस्था और विश्वास का केंद्र है ! यहाँ जहां शिव जी का परिवार ही गणेश जी के साथ वहीं पांडवों की प्रतिमाएं भी विद्यमान हैं ! मुझे और जेठू जी को पितरों को पिंड दान भी करना था, इसलिए बाल तो गौरी कुंड में ही कटवा लिए थे,
पूजा यहाँ गौरी कुंड में की और केदारनाथ में जाकर भी की ! यहाँ शंकर भगवान के दर्शन किये और अगले दिन की फ्लाईट से वापिस फाटा आये !

बद्रीनाथ
फाटा से रूद्र प्रयाग, गौचर आये ! यहाँ एक हलके जहाज़ों को उतरने के लिए एक छोटा हवाई अड्डा है जो केवल गर्मियों में ही इस्तेमाल किया जा सकता ही ! यहाँ डिग्री कालेज है, हर तरफ कुदरत की सुन्दरता बिखरी हुई है !
नन्द प्रयाग, चमोली, पीपल कोटि, हेलेंग होते हुए जोशीमठ पहुंचे ! नवम्बर में जब बद्रीनाथ के द्वार बंद हो जाते हैं तो बद्री नाथ की पूजा यहीं जोशीमठ में होती है ! यहाँ मंदिर में भगवान् पद्माशन में ध्यान मग्न हैं ! बहुमूल्य आभूषण से सस्ज्जित, ललाट पर मुकुट, मुकुट पर हीरा जड़ा है ! अगल बगल में नर-नारायण हैं ! उद्धव कुवेर और नारद की मूर्तियाँ हैं ! हनुमान जी, गणेश जी, लक्ष्मी जी की प्रतिमाएं हैं ! साथ ही एक तप्त कुंड है जहां यात्री श्रद्धा भक्ती से स्नान करते हैं और पूनी का लाभ उठाते हैं ! पुरानों में वर्णित अलकनंदा के किनारे हिमालय की गोद में बसा बद्रीनाथ जन जन की श्रद्धा का केंद्र बिन्दु है ! भारत के कोने कोने से लोग भक्ती भाव से यहाँ विपरीत परस्थितियों में भी पहुंचाते हैं अपने दुखों का निवारण करने हेतु ! पुराणों में वर्णित है की जो भी यात्री सच्ची आस्था से यहाँ अपने पितरों को पिंड दान करता है उसे फिर कहीं भी गया, बाराणसी में पिंड दान करने की जरूरत नहीं पड़ती है ! कहते हैं एक बार ब्रह्मा जी अपनी ही लड़की पर मोहित हो गए थे, इससे शिव जी को बहुत गुस्सा आया और उन्होंने ब्रह्मा जी का सर धड से अलग कर दिया ! अब ब्रह्मा जी का सर शिव जी के त्रिशूल पर ही चिपक गया ! इसके लिए वे स्वर्ग से लेकर धरती के सभी पवित्र स्थानों के दर्शन कर आये लेकिन ब्रह्माजी का सर जो त्रिशूल पर चिपका तो चिपका ही रह गया ! जब वे इस पवित्र बदरीधाम पहुंचे तो ब्रह्मा जी का सर अपने आप यहाँ गिर गया और शिव जी ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्त हो गए ! पहले ब्रह्मा जी के पांच सर थे उसके बाद अब उनके एक ही सर है !
यहाँ बड़े बड़े पांडे रहते हैं उनके बड़े बड़े होटल चलते हैं, धर्मशालाएं हैं, साफ़ सुथरा बाजार है, मंदिर के नाम पर लाखों लोगों की रोजी रोटी चलाती है, साधू है सन्यासी हैं, फ़कीर हैं, और एक बहुत बड़ी संख्या भिखारियों की है जिनको भगवान ही का सहारा है और भगवान ही उन्हें पालते हैं ! मंदिर जाने के लिए अलकनंदा पर पुल है ! यहाँ दर्शन करने के लिए पंचशिला, नाराद्शिला, वसुधारा, शेष नेत्र, चरण पादुका ! १४४००० फीट की ऊंचाई पर माणागांव है जो भारत और चीन की सीमा पर है ! एक रात श्री सतपाल जी महाराज संसद सदस्य जी के होटल में रहे और अगले दिन सुबह ही बदीनाथ जी का स्मरण करते हुए कोटद्वार के लिए निकल पड़े ! २५ सितम्बर को हम दिल्ली वापिस पहुंचे !


केदार नाथ और बद्री नाथ की छात्र छाया में पौड़ी से लेकर आगे गोपेश्वर, गुप्तकाशी, चमोली, रूद्र प्रयाग कर्णप्रयाग, सोनप्रयाग, पीपलकोटी, गौचर, जोशीमठ आदि इलाके काफी सम्पन हैं, सभी साधन होने की वजह से स्थानीय लोग खेती करते हैं और खेतों को हरा भरा रखते हैं ! यहाँ सड़कें, पानी बिजली की सुविधा होने के साथ ही जिला मुख्यालय, कोर्ट कचहरी, स्कूल, कालेज, तकनीकी शिक्षा के केंद्र होने की वजह से भी असली गढ़वाल का चेहरा यही है ! धार्मिक स्थान होने से मोटर गाड़ियां इस लाईन पर बहुत चलती हैं, इस तरह बेकारी नाम की समस्या इन स्थानों पर नहीं है ! नौकरी पेशा वाले यहाँ के लोग भी हैं, यहाँ के जवान भी सेना के हर रेजिमेंट मेंट, कोर सेना के तीनों फोर्सों में सेवा रत हैं, अधिकारी रैंक के भी हैं तो जे सी ओज जवान भी हैं ! लेकिन ज्यादातर ये लोग अवकास लेने के बाद अपने खेत खलियानों को देखने वापिस अपनी जन्म भूमि को विकसित करने आ जाते हैं ! सरकार भी मेहनतकश लोगों की मदद करती है
"ओउम"
! ! जय केदार नाथ, जय बद्री विशाल !!

मेरी कहानी (उन्तीसवाँ भाग)

मौसम बदलता है, तारीखें बदलती हैं, सरकारें बदलती हैं ! लेकिन आस्था नहीं बदलती, सभ्यता-परम्पराएं नहीं बदलती ! इंसान कभी कभी इतनी गलती कर देता है की कुदरत से छेड़ छाड़ कर बैठता है और फिर उसके कोप का भाजन बनना पड़ता है पूरी मनुष्य जाति को जीव जंतु समुदाय को ! जंगल कट गए, ईंटा रेत पत्थर से ऊंची ऊंची बिल्डिंगे बन गयी, ऊर्जा का इस्तेमाल इतना ज्यादा होने लगा की वातावरण में गर्मी से कुदरती लाखों करोड़ों साल पुराने ग्लेसियर पिघलने लगे ! समुद्र में पानी का स्तर बढ़ने लगा, नदी नाले धीरे धीरे सुखने लगे हैं ! कहीं भूकंप, कहीं बाढ़ तो कहीं ज्वाला मुखी अपना विकराल रूप दिखलाने लगता है तो दूसरी और इंसान अपने दिमाग परमाणु , हाईड्रोजन बमों को बनाने और उनका परीक्षण करने में लगा रहा है ! एक तरफ इंसान विकास की ऊंचाइयां नापते हुए विश्व को स्वर्ग बनाने की कोशीश कर रहा है तो दूसरी और प्रदूषण का दुष्ट राक्षस अपनी दुष्ट प्रवृतियों के साथ इस धरती के अस्तित्व को ही समाप्त करने में लगा है ! इंसान के ऊपर कुदरत की मार कम है की इंसान भी इंसान का दुश्मन बन कर उसको सताने में लगा है, कभी आतंकवादी बन कर तो कभी, नक्शल वादी-मावोवादी बन कर ! विश्व के बड़े बड़े वैज्ञानिक, समाज सेवक, समय समय पर अपने लेखों द्वारा लोगों को चेतावनी देते हैं ! अभी हाल ही में विश्व के राष्ट्राध्यक्षों, शासक प्रशासकों और वैज्ञानिकों की एक बैठक हुई थी कैपन हेगन में इस विषय पर कि "प्रदूषण को कैसे रोका जाए" ? विकशित और अविकसित देशों का कहना था कि विकशित देश ऊर्जा का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं और परियावरण को दूषित ऊर्जा की ज्यादा खपत कर रही है ! अमेरिका और यूरोप के विकशित देश ऊर्जा की ज्यादा खपत पर रोक लगा दें, बढ़ता हुआ प्रदूषण रुक जाएगा ! बैठक बिना किसी निर्णय के समाप्त हो गयी ! उत्तरा खंड में चीड के बहुत सारे जंगल हैं ! पतझर में चीड की बहुत सारी पतियाँ (pine needles) झर जाती हैं, रास्ते अवरुद्ध हो जाते हैं, इसमें फिसलन ज्यादा होती है, लोगों को इसके ऊपर चलते समय फिसलन से चोट लगने का भी खतरा रहता है ! सबसे बड़ा खतरा यह आग जल्दी पकड़ता है, और आग से हर साल जंगलात डिपार्टमेंट को करोड़ों का नुकशान हो जाता है ! साथ ही उत्तराखंड में एक लैंटाना नामक पौधे ने खेतों के खेत बर्बाद कर दिए हैं, नदी और नालों में जहाँ देखो इसकी सुरसा जैसी बढ़ती झाड़ियाँ मिल जाएँगी ! यह बढ़ते बढ़ते झाडी का रूप ले लेता है और अपने इर्द गिर्द कुछ भी पनपने नहीं देता ! इससे इतनी बदबू आती है की जानवर भी इसके नजदीक नहीं जाते ! इन दोनों का सही इस्तेमाल करने के लिए मेरे दोनों बेटों ने (राजेश-ब्रिजेश) ने कोटद्वार, पौड़ी गढ़वाल में एक फैक्टरी खोली है, "ऊर्जा रेनेवेवल सोलुसन प्राइवेट लिमिटेड" के नाम से ! यह फैक्टरी चीड की पत्तियों और लेंटाना की सुखी झाड़ियों का मशीन द्वारा पौउडर बनाकर दूसरी मशीन से फायर ब्रिकेट तैयार करती है ! ये फायर ब्रिकेट ईंट बनाने वाले भट्टों में कोयले की जगह इस्तेमाल किये जा सकते हैं (हो रहे हैं) होटलों में गैस की जगह इस्तेमाल हो रहे हैं ! इससे वातावरण में कार्वन डाईआक्षाईड को रोकने में मदद मिलती है ! कंपनी होटलों को स्मोक ल्यस चूल्हे भी देती है ! प्रदूषण को रोकने के इस कदम पर अभी तक जर्मनी और स्वीटजरलैंड के पत्रकार भारत आकर कंपनी के इस कदम से काफी प्रभावित हुए हैं और उनहोंने अपनी रिपोर्ट न्यूज चेनल से विश्व के सब देशों तक पहुंचा दी है !
2008
ई० अपना कार्यकाल समाप्त करके विश्व के कलेंडर से निकल गया और साल २००९ ने नए वर्ष का ताज सिर पर धर लिया ! १६ फरवरी २००९ ई० को मेरे घर में खुशियों का माहोल था, मेरे पोता आर्नव (ब्रिजेश-बिन्दु का लड़का) का जन्म हुआ था ! बड़ी लड़की और छोटा लड़का ! ईश्वर इन्हें कुशल रखे !

यह साल भी विरासत में बहुत कुछ साथ लाया है ! २००१ संसद के ऊपर हुए आतंकी हमले का सबसे बड़ा गुनाहगार अफजल गुरु जिसको सुप्रीम कोर्ट काफी दिन पहले फांसी की सजा दे चुकी है, अभी भी जनता के पैसों पर ऐस कर रहा है ! कहने को तो जेल में है लेकिन उसे जेल में भी वी वी ऐ पी ट्रीटमेंट मिल रहा है ! "जेड " सुरक्षा, टी वी, न्यूज पेपर, अब्बल दर्जे का मन पसंद खाना, मिल रहा है इस खतरनाक मुलजिम को ! उसने राष्ट्रपति से दया की मांग की है और केंद्र सरकार कोईं न कोई बहाना बनाकर इसको लटकाए हुए है ! सरकार की इस बेरुखी से कमलेश कुमारी (सी आर पी की लेडी कांस्टेबल ) जो इस हादसे में मारी गयी थी और उसे मरणोपरांत अशोक चक्र से अलंकृत किया गया था के परिवार वालों ने अपना रोष जाहिर करते हुए यह पीस टाईम का सबसे बड़ा वीरता का चक्र अशोक चक्र सरकार को वापिस लौटा दिया है !

तिरुपति मंदिर की यात्रा
कही दिनों से मन में एक इच्छा जाग रही थी की एक बार आंध्रा प्रदेश जाकर तिरुपति मंदिर में तिरुपति भगवान् के दर्शन करूं ! तिरुपति भगवान ने मेरी प्रार्थना स्वीकार कर दी और मुझे परिवार के साथ तिरुपति जाने का अवसर मिल गया ! १८ अप्रेल को मैं पूरे परिवार के साथ जेट एयर वेज से बैंगलौर गया ! बैंगलौर जाने का यह मेरा पहला अवसर था, साफ़ सुथरा और प्लानिग से बना शहर
बैंगलौर सचमुच में बड़ा खूबसूरत और आकर्षक है ! बड़े बड़े तकनीकी कालेज हैं, मेडिकल कालेज हैं, विदेशी कम्पनियाँ और मार्केट के आने से बंगलोर भारत का एक मशहूर शहरों में गिना जाने लगा है ! वहा हम लोग बी एस एफ के आफिसर्स म्यस में रहे ! कंटोमेंट एरिया देश के हर शहर की शान होती है वैसे ही बंगलौर का कैंट एरिया भी साफ़ सुथरा, बाग़ बगीचे और हरे भरे पार्क, सड़कें इसकी सुन्दरता को और भी बढ़ा देते हैं ! अगले दिन ७० किलो मीटर दूर रामगढ़ गए, यहीं पर सबसे मशहूर फिल्म 'शोले की शूटिंग हुई थी, इस तरह इस स्थान का महत्त्व और भी बढ़ गया है ! इसके बाद हम लोग मशहूर इतिहास का जाना पहिचाना शहर मैसूर गए ! टीपू सुलतान की राजधानी चारों और पहाड़ियों से घिरा हुआ मैसूर का किला, और उस किले में उस जमाने की धरोहर, टीपू सुलतान की तलवार, दीवारों पर उस जमाने की चित्रकारी देखने का लुफ्त उठाया ! यही चौमुंडादेश्वरी का मंदिर , नंदी और शिव मंदिर, लक्ष्मी रमण स्वामी मंदिर, वृदावन गार्डन, पार्क, लेक और उसमें बोटिंग का आनंद लिया ! कावेरी नदी इस शहर को वरदान है ! इसके किनारे का हरा भरा सुसज्जित रंग बिरंगे फूलों से सजा बगीचा यहाँ की शान है ! २० अप्रेल को हम लोग बंगलौर बस अड्डे से वोल्वो (स्टेट गवर्मेंट की बस) बस द्वारा तिरुपति बस टर्मिनल पर पहुंचे ! वहां से दूसरी बस द्वारा ४० किलो मीटर दूर एक पहाडी के ऊपर बालाजी का , विशाल और देश का सबसे धनाड्य मंदिर में पहुंचे ! इस पहाडी के ऊपर ही एक विशाल मैदान है, जहां एक अलग शहर बसा है मंदिर को चारों ओर से घेरे हुए ! मंदिर है बहुत बड़ा सजा सजाया बाजार है, लम्बी चौड़ी सड़कें हैं, इन पर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के लिए बसे हैं, पुलिस और सुरक्षा कर्मियों का बड़ा दल यहाँ हर समय मौजूद रहता है ! यहाँ होटल हैं, रेस्तरां हैं ! मंदिर पूरा सोने से मढा हुआ है, हर दरवाजे सोने के हैं, गुम्बद सोने की है ! हर तरफ सोना ही सोना ! साल के बारह महीने यहाँ भीड़ रहती है ! शाम को चार बजे मंदिर गेट पर पहुंचे, मुख्य पुजारी चौक के बीच में बड़े ज्योति पुंज के प्रकाश में बालाजी भगवान की आरती उतार रहे थे और यह दृश्य हमारी आँखों के सामने था, लाखों दर्शनार्थी लाईनों में खड़े हाथ जोड़ कर आरती का आनंद ले रहे थे ! आरती को बहुत ही नजदीक से देखने का लाभ उठाया ! अगले दिन फिर पुलिस गार्ड की निगरानी में मंदिर के अन्दर जाकर एक गज की दूरी से बालाजी विश्व नाथ भगवान् के दर्शन किये, उनसे सुख और अच्छे स्वास्थ्य का वरदान माँगा और प्रशाद ग्रहण करते हुए मंदिर से बाहर आये ! प्रशाद बड़े बड़े लड्डू थे और बड़े स्वादिष्ट थे ! २१ अप्रेल को चिन्नई पहुंचे, वहां भी होटल बुक था। वहां से २२/०४ को पांडु चेरी पहुंचे, वहां समुद्र का नजारा देखा, लोटस मंदिर, अरविंदो आश्रम, गणेश मंदिर, गांघी बीच महाबलेश्वर मंदिर के दर्शन करते हुए शाम को वापिस चेन्नई अपने होटल पहुंचे, रात को आराम किया और २३ तारीख को बालाजी तिरुपति भगवान को स्मरण करते हुए विमान द्वारा दिल्ली वापिस आ गए !

Monday, August 30, 2010

एक फूल चमेली का

चमेली का फूल था खिला
एक सुन्दर बाग़ में,
हंसता खिल खिलाता,
हिलता मुस्कराता,
खुशबू बिखराता ,
जिसकी भी नजर पड़ती,
देखता ही रह जाता !
विधाता ने लिखा था,
यह चमेली के भाग में ! १ !
सजती संवरती,
एक राज कुमारी उस बाग़ में आई,
फूल की सुन्दरता पर ललचाई !
सोचा इसे अपने गजरे में सजाऊँ,
इसे अपने सर का ताज बनाऊं !
उसने फूल तोड़ने को हाथ बढ़ाया,
उसी समय एक झोंका हवा का आया,
फूल टूट कर हवा के साथ चला,
कुछ दूर पर था एक सैनिक खड़ा !
फूल उसके सीने से जा लगा,
जैसे सीने पर बहादुरी का एक और मैडल आ लगा !
सैनि जा रहा था आतंकियों से लड़ने,
देश की जनता को निर्भय करने !
उसने तीन आतंकी मारे,
बाकी दुश्मन भाग गए सारे,
भागते भागते दुश्मन ने गोली चलाई,
वो सीने पर अटके फूल से टकराई,
पंखुड़ियां बिखर गयी,
पर जाते जाते सैनिक को,
दे गयी जिन्दगी एक नयी !

मेरी कहानी (अठाईसवां भाग)

२००७ ई० में मैं अपने परिवार के साथ मथुरा वृन्दावन गया, वहां भगवान श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का स्मृत चिन्ह जो वृन्दावन की कण कणों में विद्यमान है के दर्शन किए ! रास लीला मंदिर आज भी उतना ही सजग है जितना भगवान के बाल लीला काल में था ! देश विदेशों के लाखों नर नारी मस्त हो कर हरे राम हरे कृष्ण की ध्वनी के साथ ऐसे नाचते हैं की तन मन की सुध बुध भूल जाते हैं ! यहाँ तक की बृद्ध भी लगातार एक ही लेय ताल में मस्त हो कर नाचते नजर आते हैं ! यमुना का तट, कदम की डाली, गोवर्धन पर्वत मौन होकर भगवान श्री कृष्ण के आने का इन्तजार कर रहे हैं ! आवादी बढ़ गयी, यमुना का जल दूषित हो गया, मंदिरों के साथ साथ मल्टी स्टोरीज बिल्डिंगे भी बड़ी मात्रा में बन गयी हैं ! दुकाने , हट, रेडी वाले, ठेली वाले, रिक्से बड़ी मात्रा में हर नुकर और हर गली में मिल जाएंगे ! वृन्दावन में बन्दर हर पेड़ और हर मकान की छत पर या खिड़की पर बैठ मिल जाएंगे ! ये आपको कोई नुकशान नहीं पहुंचाएंगे, हाँ चश्में को जेब में ही रखें ! मुझे भी किसी सज्जन ने वृन्दावन में प्रवेश होने से पहले ही चेतावनी दे दी थी की बन्दर आँखों से चस्मा उतार देते हैं ! लेकिन शायद मैं भूल गया था और मार्केट से गुजरते हुए मैंने चस्मा आँखों पर लगा लिया ! अचानक कहीं से एक बन्दर आकर मेरे कंधे पर बैठा और इतमिनान से मेरे चश्मे को आँखों से उतार कर छलांग लगाता हुआ पेड़ पर चढ़ गया ! जब तक मैं संभल पाता, बन्दर पेड़ की ऊंचाइयां नाप चुका था ! सामने बैठे एक दुकानदार ने मुझे कहा "इसको कुछ खिला दो, चस्मा वापिस दे देगा" ! कुछ दूरी पर एक हलवाई से डब्बल रोटी पकोड़ी लाया, हाथ जोड़ कर विनती की, "हे श्री हनुमान जी की सेना के सेना नायक, कृपया अपनी भेंट ले जांय और मेरा चस्मा मुझे लौटा दें " ! और सचमुच चमत्कार हो गया ! बन्दर महोदय चश्मे को मुंह में दबाए छलांग लगाते हुए मेरे सामने आये एक हाथ से मेरा चस्मा मुझे वापिस किया और दूसरे हाथ से डब्बल रोटी पकोड़ी ली और छलांग मार कर पेड़ पर चढ़ गए ! २७ मार्च २००७ ई० को हम पूरे परिवार के साथ शिरडी मंदिर गए, वहीं साईं बाबा के दर्शन किए ! मौसम ठीक था ! बच्चों की परीक्षाएं हो चुकी थी बच्चे भी साथ थे करण, नीतिका, आर्शिया ! निज्जामुद्दीन स्टेशन से रेल द्वारा स्टेशन पहुंचे वहां से मंदिर के लिए बस का सहारा लेना पड़ा ! यहाँ सारी सुविधाएं हैं , अच्छे अच्छे होटल हैं, मंदिर के भीतर ही बहुत सारी दुकाने हैं ! मंदिर के बाहर भी दुकाने हैं लेकिन ये मंदिर सामग्री बहुत मंहगी देते हैं ! सुबह चार बजे बाबा की आरती होती है, इस आरती का विशेष महत्त्व है ! इसलिए बहुत लम्बी लाईन लग जाती है ! मंदिर में ज्योति लगातार जलती रहती है !
दर्शन करने के लिए बहुत कुछ है, बाबा का शयन कक्ष, वह पेड़ जिसके नीचे बाबा पहले आ कर बैठे थे ! कुदरत भी मेहरवान है इस स्थान की खूबसूरती को और बढाने के लिए ! साईं बाबा के नाम का जाप करते हुए हम लोग वापिस दिल्ली आ गए !
पाकिस्तान की भूत पूर्व प्रधान मंत्री और जेड ए भूट्टो की लड़की बेनजीर भूट्टो कही सालों बाद पाकिस्तान वापिस आई थी, २७ दिसम्बर २००७ को किसी निर्दयी आतंकवादी ने उसे गोली का निशान बना दिया ! उसी दिन उसकी मृत्यु हो गयी !
२० मई २००८ मैं अपनी पत्नी के साथ अमेरिका के लिये रवाना हो गया ! २९ जून को ब्रोंक्स जू देखने गए ! यह जू जंगल में है जहां पानी से भरे नाले हैं, आसमान को छूते पेड़, किस्म किस्म के पौधे
, एक तरफ जंगल में मंगल तो दूसरी और विशाल चिड़िया घर है ! हर जानवर के लिए उसकी आदत को ध्यान में रखते हुए लम्बी चौड़ी जगह बांटी गयी है ताकी वह कुदरती माहौल का अनुभव करे ! शेर है तो उसको घूमने फिरने के लिए काफी बड़ा इलाका है ! इसी तरह रीछ के लिए गुफा है ! हाथी ऊँट घोड़े जंगली बकरे, हिरन, जेब्रा, जिर्राफ, दरियाई घोड़ा, मगर, भेडिया, चीते, बाघ, बन्दर सबको उनकी मन पसंद जगह और माहोल दिया गया है ! चिम्पाजी, गोरीला, गिब्बन, गिलहरी जैसी पूँछ वाले बन्दर, रिंग टेल्ड लेमूर, वर्वेट बन्दर, ओरेंज उतांस और भी कही तरह के बन्दर की जातियां इस जू की शान है ! उल्लू की कही किस्में, विभिन्न प्रकार की चिड़ियाएँ इस जू में देखने को मिल जाती है ! एक सिरे से दूसरे सिरे तक जाने के लिए, मोनो रेल, बस या फिर स्काई राइडिंग का इंतजाम है ! हर स्थान पर गाइड है जो हर जानवर और उसकी आदतों की जानकारी पर्यटकों को देता है ! झील हैं उसमें कछुवे हैं मच्छलियां हैं ! अक्वेरियम है जिसमें कुदरती आक्सीजन और पानी का प्रबंध है ताकि जल जंतु स्वछंद हो कर घूम फिर सकें ! हजारों किस्म की तितलियों का एक अलग ही प्रदेश है ! हर स्थान पर रेस्तरां हैं जहां खाने पीने की वस्तुएं मिल जाती हैं ! पूरा जू देखने के लिए पूरा एक दिन चाहिए ! हाथी और ऊँट की सवारी बच्चों के मनोरंजन के लिए हर समय तैयार रहती है !
ओलम्पिक २००८ का आयोजन चीन ने किया और ५१, गोल्ड, २१ सिल्वर, २८ ब्रोंज मेडल के साथ विश्व में नम्बर वन के विक्टरी स्टैंड पर आकर खड़ा हो गया ! अमेरिका, ३६ गोल्ड, ३८ सिल्वर और ३६ ब्रोंज के साथ नम्बर दो पर खिसक गया ! भारत को बहुत सालों बाद अभिनव बिंद्रा ने शूटिंग में एक मात्र गोल्ड दिलाया, बोक्सिंग में विजेंदर और कुस्ती में सुशील कुमार ने ब्रोंज लेकर संतोष कर लिया !
०४ नवम्बर 2008 के दिन अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव हुआ जिसमें पहली बार एक अश्वेत बराक हुस्सेन ओबामा को अमेरिका की जनता ने राष्ट्रपति के लिए चुना ! वे ४७ साल के हैं पेशे से वकील हैं ! १८ नवम्बर २००८ को हम दोनों मिंया बीबी वापिस इन्डिया चले गए !

मुंबई पर आतंकी हमला
२६ नवम्बर २००८ को पाकिस्तान द्वारा पाले गए आतंकियों ने समुद्री मार्ग से आकर अचानक मुंबई पर हमला करके सैकड़ों निर्दोष लोगों की ह्त्या कर दी ! इस जघन्य ह्त्या काण्ड की विश्व भर के राष्ट्राध्यक्षों द्वारा निंदा की गयी ! एक तरफ पाकिस्तान भारत पर शांती वार्ता के लिए दबाव डाल रहा था और दूसरी और उसके सैनिक और ऐ एस ऐ संगठन भारत पर आतंकी हमला करने की साजिस रच रहे थे ! अमेरिका द्वारा दान खाते की रासी से ये आतंकी हथियार गोला बारूद खरीद रहे हैं और "हम तो मरेगे ही पड़ोसी को चैन से नहीं रहने देंगे" का इरादा करते हुए आतंक का माहोल बना रहे हैं ! इन्होने २६ नवम्बर से २९ नवम्बर तक करीब १० वारदातें की जिसमें १७३ लोग मरे, ३०८ घायल हुए ! ताज महल होटल को आग के हवाले कर दिया ! बाक़ी आतंकी तो सारे मारे गए थे एक अजमल कसब नाम का आतंकी को ज़िंदा पकड़ लिया गया था ! ६ मार्च २०१० को ट्रायल कोर्ट ने उसे फांसी की सजा सुनाई ! आजकल हाई कोर्ट में उसके केस की सुनवाई चल रही है ! करोड़ों रुपये उसके खाने पीने सुरक्षा पर लग रहे हैं और अभी पता नहीं है की यह केस कितना और खींचेगा ! उधर पाकिस्तान ने पहले तो मरे और जिन्दे आतंकवादियों को पाकिस्तानी मानने से ही इनकार कर दिया ! जब ज्यादा जोर पड़ा और अंतर्राष्ट्रीय विरादरी में पाकिस्तान की साख गिरने लगी तो उसने मुंबई के आतंकवादियों को पाकिस्तानी नागरिक स्वीकार कर लिया ! अब तो आलम यह है की ये आतंकवादी पाकिस्तान के लिए ही सर दर्द बन गए हैं !

Saturday, August 28, 2010

मेरी कहानी (सत्तायसवां भाग)

२००७ मई के महीने में हम दोनों पति पत्नी यहाँ न्यू योर्क आ गए थे ! ०८ जून २००७ को यहीं मेरा पोता वेदान्त का जन्म हुआ (राजेश-काजल का दूसरा पुत्र) ! यहाँ का मौसम अप्रेल से बदली होने लगता है ! सरदी बर्फ से शुरू होती है और बर्फ के पिघलने के साथ ही समाप्त हो जाती है ! गर्मी यहाँ होती नहीं है लेकिन कभी कभी टेम्प्रेचर बढ़ जाता है ! यहाँ गर्मी आती तो है लेकिन कम ! इस तरह अप्रेल से नवम्बर तक यहाँ घूमने फिरने मौज मस्ती करने का भरपूर आनंद लिया जा सकता है ! नवम्बर से मार्च तक दिल्ली के मौसम से रूबरू होते हैं ! दिल्ली का अपना मौसम तो होता ही नहीं है, राजस्थान में आंधी चली तो पूरा दिल्ली आंधी द्वारा लाया गया बालू और धुंध से घिर जाएगा, शिमला में बर्फ पडी तो शीत लहरों की ठंडी हवाएं दिल्ली वालों को ठिठुरने के लिए मजबूर कर देगी ! दिल्ली वाले अपने गर्म कपड़ों को अप्रेल के महीने तक रेडी मेड रखते हैं ! दिल्ली में एक नदी है यमुना ! शास्त्रों में वर्णित ! यमनोत्री से निकल कर कही ऊंचे ऊंचे पर्वत शिखरों से नीचे उतर कर उत्तराखंड, हिमांचल प्रदेश, हरियाणा के किसानों के खेत खलियानों को हरा भरा करती हुई दिल्ली आते आते तक एक गंदे नाले में परवर्तित हो जाती है ! हरियाणा अगर बचा हुआ पानी यमुना में छोड़ देता है तो गर्मियों में दिल्ली वालों की प्यास बुझ जाती है, नहीं तो बड़े लोगों के बंगलों में तो शुद्ध जल की वर्षा होती रहती है, गरीब जमीन के अन्दर से निकले नमकीन पानी पीकर ही गुजारा कर लेते हैं ! मौसम को देखते हुए हमारा भी प्रोग्राम इसी तरह बनता है मई से नवम्बर तक अमेरिका बड़े बेटे के पास, दिसंबर से अप्रेल -मई दिल्ली छोटे बेटे के पास ! इन्हीं दिनों एक बार वरमोंट अमेरिका का न्यू हेम्पशायर से लगा हुआ प्रदेश की ख़ूबसूरत वादियों को देखने के लिए गया बच्चों के साथ ! वूड स्टोक नामक सिटी एक पहाडी की गोद में बसा हुआ है ! साथ ही एक नदी भी है जो पहाड़ों के शिला खण्डों से टकरा टकरा कर नीचे उतरती है ! हम जरा नदी के साथ साथ और आगे चले गए, वहां नदी विशाल शिला खण्डों से टकरा कर घंने जंगलों के बीच से दिल को हिलाने वाला शब्द करती हुई नीचे उतर रही थी ! नदी के दोनों तरफ पक्की सड़कें हैं, कहीं कहीं पर उन जंगलों में सैलानियों के लिए, हाईकिंग करने का पूरा बंदोबस्त है ! यात्रियों की सुरक्षा का भी पूरा प्रबंध है ! स्थानीय सरकार और जनता ने मिलकर उसे रमणीक बना दिया है की एक बार जाने वाला उस घाटी को बार बार देखना चाहता है ! जंगल में मंगल वाली कहावत चरितार्थ हो जाती है कुदरत की इस अनुपम छटा को देख कर ! एक पर्वत शिला खंड का सहारा लेकर खड़ा था, एक बार तो ऐसा लगा की मैं यहाँ पहले भी आया हूँ, जैसे ये मेरी जानी पहिचानी जगह है ! जितनी उग्रता से नदी पर्वतों से नीचे उतरते हुए होती है उतनी ही शांत वह मैदानों में आकर हो जाती है ! नवम्बर में दिल्ली वापिस चले गए !

Thursday, August 26, 2010

मेरी कहानी ( छब्बीसवां भाग )

राजेश जनवरी २००४ को एक साल के लिए अमेरिका से इंगलैंड चला गया था ! वहां इंग्लैण्ड काजल की ममी डैडी, मेरी लड़की उर्वशी और ध्योता करण और ध्योती नीतिका भी टूर वीजा पर गए ! वहां इन लोगों ने एक महीने खूब घुमाई की ! जनवरी २००५ में राजेश-काजल आत्रेय के साथ वापिस अमेरिका न्यू योर्क आ गए ! मैं अब के अकेला मार्च के महीने में अमेरिका आया बच्चों के पास ! यहाँ लौंग ऐलैंड, मेलविल में फ्लेट लेकर बच्चे रह रहे थे ! उस समय पूरा इलाका बर्फ से ढका हुआ था ! सीत लहरें चल रही थी ! इलाका साफ़ सुथरा और घूमने के लिए काफी अच्छा था ! कालोनी को घेरते हुए एक पगडंडी बनी थी डेढ़ दो किलो मीटर की, इसी पर सुबह शाम घूमने का लुफ्त उठाता था ! सड़क पार अध्या प्रशाद्सिंह एक हिन्दुस्तानी परिवार रहता है ! ये लोग उत्तर प्रदेश जिला प्रताप गढ़ के ठाकुर हैं ! अचानक इनसे मुलाक़ात हो गयी और फिर इनके साथ बहुत ही अच्छे सम्बन्ध बन गए ! काफी घुमाई की, न्यू यार्क शहर, (मैनहट्टन), जहां २००१ में आतंक वादियों ने दो वर्ड ट्रेड टावर गिराए थे वह स्थान भी देखा ! इम्पायर स्टेट की गगनचुम्बी इमारत के ऊपर चढ़ कर जिसमें न्यू यार्क, समुद्र, जंगल आलीशान इमारतें देखी ! यहीं पर एक लघु पिक्चर भी दिखाई गयी ! जिसमें न्यू योर्क का इतिहास, कही टापुओं को मिलाने के लिए समुद्र के अन्दर सुरंगे, समुद्र के ऊपर विशाल पुल, मल्टी स्टोरीज बिल्डिंगे, स्कूल कालेज, विश्व के लोगों का संगम मैनहट्टन, चाइना टाउन, जौहन हाईट (यह भारतीयों की बस्ती है) ! जगमगाता हुआ मार्केट जहां संसार के हर देश का सामान उपलब्ध है ! टाइम स्क्वायर, और बहुत सी गलियाँ, सारे देशों की अम्बेसीज, संयुक्त राष्ट्र का मुख्यालय, पुराने और आधुनिक चर्च, समुद्र की लहरों से खेलने वाले सैलानी सिटी के हर कोने में सुविधावों से लैश बीच, छोटे बड़े जहाज, मोटर बोट, होटल, रेस्टोरेंट, जैसे सारी दुनिया यही आकर बस गयी हो ! भारतीय लोगों के बड़े बड़े स्टोर "पटेल ब्रदर्स, जेवेलेर्स शाप", जहां हिन्दुस्तानियों के लिए अपने देश की सारी वस्तुवें मौजूद हैं !
यहाँ अमेरिका में भारतीय राजपूतों की एक बड़ी "राजपूत सभा" है ! साल में एक बार सारे अमेरिकन राजपूतों की सालाना मीटिंग होती है, कभी न्यू यार्क में तो कभी दूसरे प्रदेशों में ! इस साल मीटिंग न्यू यार्क में ही थी, शेर बहादुरसिंह जी इसके अध्यक्ष थे, उनहोंने हमें भी इस मीटिंग में सामिल होने के लिए निमंत्रण भेजा था और हमारे परिवार के सारे सदस्य इस मीटिंग में सामिल हुए थे ! तीन या छ महीने में प्रदेश स्तर पर राजपूत सभा की मीटिंगे होती रहती हैं ! मीटिंग शुरू होने से पहले दुर्गा की पूजा का विधान है और एक बार तो एक मीटिंग में श्री एस बी सिंह के अनुरोध पर मुझे ही पूजा करने का दायित्व निभाना पड़ा ! एक बार हनुमान मंदिर में मैंने कविता पाठ किया और लोगों ने कविता की सराहना की ! बल्की उस कविता की चंद पंक्तियाँ मंदिर कमेटी की मैगजीन में भी छापी गयी !
जौलाय में मेरी पत्नी आ गयी थी और मैं अगस्त में दिल्ली चला गया ! पत्नी भी दिसम्बर में दिल्ली आ गयी थी !
मई २००४ ई० के संसद चुनाव में कोई भी सिंगल पार्टी बहुमत में न आने से कांग्रेस के नेतृत्व में यू पी ए ने केंद्र में सता संभाली और डा० मन मोहनसिंह प्रधान मंत्री बनाए गए ! एक सज्जन, ईमानदार, महान अर्थशास्त्री और योग्य शासक मिला था देश को ! जनता खुश थी ! लेकिन जनता को बाद में पता चला की सता का केंद्र बिंदु तो कहीं और है ! मन मोहन सिंह जी, प्रधान मंत्री हैं पर सता का रिमोट कंट्रोल तो कांग्रेस अध्यक्ष के हाथ में है ! मंहगाई, बेकारी का प्रतिशत बढ़ने लगा, गरीबों की संख्या में इजाफा होने लगा, पाकिस्तान आतंकवाद को बढ़ावा देता रहा, सता के गलिहारों में भ्रष्टाचार जोर पकड़ने लगा, लेकिन मन मोहन जी की सज्जनता फिर रंग लाई और २००९ ई ० के संसद के चुनाओं में कांग्रेस की यू पी ए को फिर गद्दी दिला दी ! मन मोहनसिंह जी की दूसरी पारी शुरू हो गयी है प्रधान मंत्री की कुर्सी पर !
अक्टूबर २१, २००७ फिर एक बुरी खबर लेकर आया, मेरा चहेरा भाई अवकाश प्राप्त ले.कर्नल मनोहरसिंह दिल का दौरा पड़ने से स्वर्ग सिधार गया ! एक मुस्कराता हुआ चेहरा, एक हंसने हंसाने वाला भाई अचानक हमारे मध्य से चला गया संसार के सारे बंधनों को तोड़ कर ! वह तो चला गया लेकिन सारे परिवार को दुखी छोड़ गया !

Wednesday, August 25, 2010

एक और यात्रा (न्यू योर्क से बोस्टन तक)







२१ अगस्त को अचानक कुछ और ऐतिहासिक स्थानों को देखने का प्रोग्राम बन गया ! बोस्टन (माच्यूसेट्स स्टेट ), न्यू हम्पशायर और वरमोंट की सुन्दर पहाड़ियों और घाटियों को देखने को मन ललचाया, तो फिर क्या था सामान तैयार किया और चल पड़े मंजिल की ओर ! अब के परिवार के सभी लोग जा रहे थे ! राजेश की ऑफिसियल मीटिंग भी थी न्यू हम्पशायर में, इस तरह "एक पंथ दो काज" वाली कहावत को चरितार्थ करने का अच्छा मौक़ा था ! दो पार्टी बनी एक रेल और बस द्वारा और दूसरी पार्टी सीधे कार द्वारा ! मैं और करण बस - रेल द्वारा जाने के लिए तैयार हो गए ! राजेश बच्चों के साथ कार से चल पड़ा ! यहाँ अमेरिका में कही बार आ चुका हूँ, कही जगह घूम भी चूका हूँ लेकिन केवल कार द्वारा ही सफ़र किया है ! यह पहला अवसर था अमेरिकन बस और ट्रेनों, मेट्रो में सफ़र करने का ! यहाँ अपने घर से कुछ ही दूरी पर पड़ता है फार्मिंगडेल रेलवे स्टेशन, हमने इस स्टेशन से ११ बजे वाली ट्रेन पकड़ी और बाथापेज, हिक्सविल्ल होते हुए जमैका पहुंचे ! यहाँ की ट्रेनों में कोई बड़ा छोटा नहीं है ! सब की सीटें एक जैसी हैं गद्दीदार और आराम दायक ! बाथ रोम साथ सुथरे और आधुनीक सुविधाओं से लैस ! भीड़ भी नहीं थी ! सरकारी कर्मचारी सतर्क और अपने कर्तव्यों के प्रति ईमानदार रहते हैं, ड्यूटी के समय तन - मन से ड्यूटी और छुट्टी का समय बिना किसी चिंता के मस्ती से छुट्टी का आनंद लेते हैं ! जमैका से हमने मैनहट्टन तक मेट्रो पकड़ी और एक बजे चायना टाउन न्यू योर्क सिटी पहुंचे ! यहाँ पर बोस्टन जाने के लिए लकी स्टार नामक एजेंसी की बस खडी थी, हमारे बैठते ही बस चल पडी ! रास्ते में जंगल पहाड़ियां, नदी नाले, लम्बे चौड़े घास के मैदान आते गए, और हम कुदरत के इन हसीन नजारों का अवलोकन करते हुए आगे बढ़ते रहे ! बस में आराम दायक सीटें थी ! अमर्जेंसी में बस के अन्दर ही बाथ रोम की व्यवस्था है ! ड्राइवर- क्लीनर अच्छे गाइड भी थे, हर सिटी और कस्बे के बारे में जानकारी देते रहते थे ! यात्रियों के साथ उनका व्यवहार मित्रता पूर्ण था ! साढे चार घंटे की यात्रा सहज और आराम दायक लगी ! पौने पांच बजे हम लोग बौस्टन बस स्टेंड पर पहुंचे ! राजेश हमारा इंतज़ार क्वींसी मार्केट पर कर रहा था ! वहां जाने के लिए हमें सुरक्षा गार्ड ने रेलवे स्टेशन से ट्रेन लेने की सलाह दी ! स्टेशन पर हमें ट्रेन के गार्ड से ही भेंट हो गयी ! गाडी तैयार खडी थी, उसने हमें उसमें बैठने के लिए कहा ! हम स्टेशन की तरफ टिकट लेने के लिए जाने लगे, उसने रोक दिया और कहा, "एक स्टेशन के लिए आपको टिकट लेने की जरूर नहीं है " ! हम बिना टिकट के ही बैठ गए, टिकेट चेक करने वाला आया, उसे गार्ड ने हमारे बारे में पहले ही बता दिया था, उसने हमसे कुछ नहीं पूछा और आगे चला गया ! उनके मित्रता पूर्ण व्यवहार से हमें अपना भारत याद आया ! क्या हमारे रेलवे कर्मचारी भी विदेशी यात्रियों से ऐसा ही मित्रता पूर्ण व्यवहार करते हैं ? एक प्रश्न पूछते हैं हम अपने आप से अपने चरित्र के बारे में ! हम क्वींसी मार्केट पहुंचे वहां पर राजेश का दोस्त पंकज अपनी पत्नी दीपा और दो बच्चियों रैना और रिया के साथ खडा था ! उसने हमें क्वींसी मार्केट और बोस्टन की जानकारी दी !
बोस्टन अमेरिका के इतिहास में एक विशेष स्थान रखता है ! स्वतंत्रता का पहला बिगुल यहीं से बजा था ! क्वींसी मार्केट के सामने वाली बिल्डिंग में ही पौल रेवियर के नेतृत्व में स्वतंत्रता सेनानियों की मीटिंग चला करती थी, यहीं पर ब्रिटिश आर्मी के खिलाफ मोर्चा बंधी की योजना बनती थी ! पौल रेवियर यहाँ की जनता में बहुत मशहूर है और लोग आज भी उसके कारनामें अपने बच्चों को सुनाते है ! एक घटना के मुताबिक़ अंगरेजी सेना अगले दिन पौल रेवियर और उसके साथियों के ऊपर अचानक हमला करने की योजना बना रहे थे, वहीं एक १०-१२ साल का लड़का अंग्रेजों के अस्तबल में काम करता था, उसके कानों में बात पड़ गयी ! वह लड़का रात को ही पौल रेवियर के पास आया और उसे अंग्रेजों के षडयंत्र की जानकारी दे दी ! सरदी का मौसम चारों ओर बर्फ ही बर्फ, पौल रेवियर ने बर्फ के ऊपर घोड़े में बैठ कर पूरी रात सारे साथियों को होशियार कर दिया, अपने हथियार और गोला बारूद को सुरक्षित जगह पर छिपा दिया ! अगले दिन सबेरे ही अंगरेजी सेना वहां पहुँची लेकिन यहाँ तो स्वतंत्रता सेनानियों की पूरी तैयारी थी ! ब्रिटिस सेना को मुंह की खानी पडी ! यहाँ पर देखने को बहुत कुछ है, विशाल समुद्र में बोट मोटर बोट की सैर, अक्वेरियम जहां हर तरह के जल जीव और बड़ी से बड़ी और छोटी से छोटी मच्छलियाँ यहाँ देखने को मिल जाती हैं ! गगन चूमती इमारतें, होटल, रेस्टोरेंट, रंग बिरंगे फूलों से लदे बाग़ बगीचे, लम्बे चौड़े पार्क, हरे भरे जंगल बच्चों के मनोरंजन के लिए हर प्रकार की सुविधाएं यहाँ मौजूद हैं ! शुक्रवार शाम से और इतवार के ६ बजे तक यहाँ मेला लगा रहता है, लगता है जैसे सारी दुनिया यहीं आकर इकट्ठा हो गयी है ! इन दिनों होटलों में कमरे भी नहीं मिलते पहले ही बुक हो जाते हैं ! रात को पंकज के पास रहे !
ह्वाईट माउन्टेन
अगले दिन यानी २२ अगस्त को हम सब लोग न्यू हम्पशायर ग्रीन लीफ इस्टेट्स पंकज के घर से उत्तर की ओर चल पड़े ! दो घंटे के बाद हम ह्वाईट माउन्टेन एरिया में थे ! यहीं से हम बस में बैठे और बस ने हमें दो मील पर जाकर उतार दिया ! उसके बाद एक पहाडी नाले के साथ साथ आगे बढे ! रास्ता सुविधाजनक था ! हमारे साथ चार बच्चे थे वेदान्त तीन साल का था वह भी हमारे साथ चल रहा था ! सबसे छोटी रिया थी जो अपनी मम्मी की गोदी में ही रही ! नाले के दोनों किनारों में सीधी चट्टाने थीं ! बाईं तरफ की चट्टान के साथ साथ लकड़ी का पुल बना था जो करीब आधा मील लंबा था और नाले के साथ साथ ऊपर उठता जा रहा था ! इस नाले पर दो झरने भी मिले करीब १५-२० फीट ऊंचाई से गिरने वाले, जो इस संकरी घाटी में कुदरत के करिश्मों का बयान कर रहे थे ! ऊंचे ऊंचे पेड़ों और विभिन प्रकार के पौधों से घिरा हुआ जंगल उठती हुई चट्टानें यही तो है व्हाईट माउन्टेन, धरती के ऊपर कुदरत का करिश्मा ! हम लोग हाईकिंग कर रहे थे और रास्ते में भालू की गुफा, भेडिये की गुफा को देखते हुए आगे बढ़ रहे थे ! इस पहाडी से दो नाले निकलते हैं जो कहीं कहीं ऊंचाई से गिरने पर प्रपात बनाते हैं और सैलानियों का ध्यान अपनी ओर खींचते हैं ! विशाल शिला खण्डों के ऊपर से गुजरता है विशाल जल राशि जो आगे चल कर नदीं में मिल कर एकाकार हो जाती है ! दूर बहुत दूर दिखाई देता है क्षतिज जहां ये पहाडी श्रृंखलाएं मिल जाती हैं नीले आकाश से ! आसमान बादलों से ढका था, कभी कभी हल्की हल्की बुँदे गिरने लगती थी ! एक सिरे से दूसरे सिरे तक का पहाडी सफ़र कभी चढ़ाई तो फिर उतराई पूरी करके हम वापिस घर की ओर चल पड़े, पंकज के घर !




एक लेख के अनुसार २५००० साल पहले (आईस एज) बर्फीले युग के बाद बर्फ के पिघलने से बनी है ये घाटियाँ, झीलें चश्मे ! विशाल शिला खंड भी बर्फ से कटे हैं ! १८०० ई० के बाद यहाँ सैलानी इन खूबसूरत वादियों और पर्वत श्रृंखलाओं को देखने के लिए आने लगे ! मूस यहाँ का एक बहुत बड़ा पापुलर जंगली जानवर है ! यह बारहसिंघे की नसल का है लेकिन उससे बड़ा और ताकतवर है ! हम तो नहीं देख पाए लेकिन कहते हैं शाम को सडकों पर आजाते हैं ! न्यू हम्पाशायर और कनिटिकट की नदी जो वरमोंट और हम्पशायर की सीमा है के आस पास के इलाके में भी मूस मिल जाते हैं ! २३ अगस्त को बच्चों को एक ऊंचे पर्वत के समतल स्थान पर ले गए, वहां म्यूजियम, रौलर कास्टर रेल और दूसरे और भी कही चींजे बच्चों दिखाई और उनका मनोरंजन किया ! २४ अगस्त को हम लोग वापिस अपने घर आगये !

Friday, August 20, 2010

मेरी कहानी (पच्चीसवां भाग)

यह इक्कीसवीं सदी मेरे प्यारे प्रदेश उत्तराँचल वनाम उत्तराखंड के लिये एक वरदान बन कर आया ! उस समय केंद्र में भा ज पा की सरकार थी ! और भा ज पा ने ही भारतीय संविधान के अन्दर तीन नए राज्य बना दिए, उत्तर प्रदेश से उत्तरांचल जो बाद में उत्तराखंड बन गया, मध्य प्रदेश से छतीस गढ़ और बिहार से झारखंड ! उत्तरांचल ९/११/२००० को भारत सरकार के प्रदेशों में एक नया प्रदेश जुड़ गया ! यह प्रदेश उत्तराखंडियों को आसानी से नहीं मिला, इसके लिए भी आन्दोलन का सहारा लेना पड़ा, रैली निकाली गयी, कुर्वानी देनी पडी ! भारत को आजाद करने के लिए विदेशी हकूमत अंग्रेजों से संघर्ष था लेकिन अलग प्रदेश के लिए तो अपनी ही सरकार अपनी ही पुलिस से संघर्ष करना पडा, कुर्वानी देनी पडी खून बहाना पड़ा तब कहीं जाकर उत्तराखंड एक अलग राज्य बन पाया ! अगर इतिहास पर जरा नजर डालें तो नए राज्य के लिए सबसे पहला आन्दोलन चलाया गया था सन १९५७ ई० में टेहरी गढ़वाल के भूतपूर्व नरेश मानबेंद्र शाह के नेतृत्त्व में ! फिर २७/०७/ १९७९ ई० को स्थानीय पार्टी उत्तराखंड क्रांती दल अस्तित्व में आया और उसके अध्यक्ष डॉक्टर डी डी पन्त की अध्यक्षता में उत्तराखंड के लिए संघर्ष शुरू हुआ ! फिर सन १९९१ ई० में भा ज पा सबसे बड़ी पार्टी बन कर आई और आन्दोलन को बल मिला ! कांग्रेस तब तक चुपचाप तमाशा देख रही थी ! असल में कांग्रेसी उत्तर प्रदेश से अलग राज्य की माँग कर ही नहीं रहे थे ! सन १९९४ ई० में विद्यार्थियों का आन्दोलन शुरू हुआ, १९/०८/१९९४ में नैनीताल के तमाम सरकारी कर्मचारियों ने "पेन डाउन स्ट्राइक " कर दी ! १/०९/१९९४ ई० को खटीमा में पुलिस ने आन्दोलन कारियों पर गोली बरसाई ! इस फाइरिंग में काफी मरे और काफी जख्मी हुए ! हल्द्वानी और खटीमा में कर्फ्यू लगाया गया था ! २/०९/१९९४ ई० को पुलिस ने मंसूरी में आन्दोलन कारियों के ऊपर गोली चलाई और ७ लोगों को मार गिराया ! महात्मा गांधी जन्म दिन पर ०२/१०/१९९४ को उत्तर प्रदेश पुलिस ने महिलाओं और उत्तराखंडियों के ऊपर मुज्जफर नगर में जुल्म ढाए, महिलाओं को बेइज्जत किया गया ! ये लोग रैली में भाग लेने के लिए दिल्ली जा रहे थे ! दिल्ली में भी कही जगह पर आन्दोलनकारियों के ऊपर पुलिस ने लाठी चार्ज किया कहीं कहीं गोलियां भी चलाई गयी ! कुछ लोग दिल्ली में भी मारे गए थे ! १९९१- ९६ में प्रधान मंत्री थे नरसिंघा राव ! काफी कुर्वानी के बाद तब कहीं जाकर ०५/०८/१९९६ ई० को उस समय के प्रधान मंत्री एच डी देवेगौडा ने "भारतीय संविधान में एक नया राज्य उत्तरांचल के नाम से बनाने की घोषणा की" ! १९९८ ई० में अटल बिहारी बाजपेयी सरकार ने नया राज्य बनाने के लिए ऑर्डिनेंस निकाला ! १७/०५/२००० को लालकृष्ण अडवानी गृह मंत्री ने बिल संसद में पेश किया ! संसद ने इसे पहली अगस्त २००० को सर्व सम्मति से पास किया गया, राज्य सभा ने इसे १०/०८/२००० को मंजूरी दे दी ! महामहीम राष्ट्रपति उत्तर प्रदेश/विधान/सभा में इस पर हस्ताक्षर करके मोहर लगा दी ! इस तरह हिमालय की सीमा में एक नया राज्य बना "उत्तरांचल वनाम उत्तराखंड" !
उत्तर प्रदेश विधान सभा में भारतीय जनता पार्टी के विधायकों की संख्या ज्यादा रही इसलिए, उत्तराँचल में पहली सरकार भा ज पा की बनी, मुख्य मंत्री बने नित्यानंद स्वामी जो २९/१०/२००२ तक कुर्सी पर रहे, उनके बाद भगत सिंह कोशियारी को मुख्य मंत्री बनाया गया वे ०१/०३/२००३ तक रहे ! उनके मुख्य मंत्री काल में चुनाव हुए और कांग्रेस सता में आ गयी ! नारायण दत्त तिवारी मुख्य मंत्री बने और ७ मार्च ०७ सात तक कुर्सी पर डटे रहे ! मार्च २००७ में बा ज पा फिर से सता में आई और भूत पूर्व मेजर जनरल भुवन चन्द्र खंडूरी मुख्य मंत्री बने ! वे २३ जून ०९ तक ही सता पर रह सके ! वे अनुशासित और एक सुलझे हुए शासक थे, वे खुद ईमानदार थे और अपने मंत्रियों को भी ईमानदार बने रहने सलाह देते थे ! कुछ भ्रष्टाचारी नेताओं को उनकी सलाह अच्छी नहीं लगी और उनके खिलाफ लामबंद हो गए ! ऐसी विषम प्रस्थिति में उन्होंने मुख्या मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया ! २४ जून २००९ से डा० रमेश पोखरियाल निशंक मुख्य मंत्री की कुर्सी पर आसीन हैं ! प्रदेश का प्रथम राज्यपाल थे सुरजीतसिंह बरनाला, और आज के राज्यपाल हैं मारग्रेट अलवा !

Thursday, August 19, 2010

मेरी कहानी (चौबीसवां भाग)

बटालियन में
सेना से रिटायरमेंट के १५ साल बाद २० राजपूताना राईफल्स ने बटालियन के २१ वें रेजिंग डे पर बुलाया ! उस समय यूनिट जम्मू और पठानकोट के बीच में साम्भा में थी ! साम्भा एक छोटा सा रेलवे स्टेशन भी है, लेकिन यहाँ पर केवल पैसेंजर ट्रेन ही रुकती हैं, मेल एक्ष्प्रेस नहीं रुकती ! मैं अपनी पत्नी और द्योति नीतिका के साथ पहली जनवरी २००० को बटालियन के लिए चल पड़े ! दो जनवरी २००१ रात के एक बजे हम लोग जम्मू पहुंचे, वहां यूनिट की गाडी हमारे लिए खडी थी हमें सीधे यूनिट में ले गयी ! जब बटालियन रेज हुई थी पहली जनवरी १९८१ ई० को तो सबसे पहले यूनिट में ऐ एम ए देहरादून से कमीशन लेकर २/लेफ्टीनेंट आर पी जोशी साहेब आये थे ! आज वे बटालियन के कमांडिंग अधिकारी थे ! सूबेदार मेजर अमरसिंह जो शायद मेरे रिटायरमेंट के समय हवलदार रहे होंगे ! अगले दिन कार्यकर्म में शामिल हुए ! अच्छा इंतजाम था, दो दिन का व्यस्त कार्यकर्म था और तीसरे दिन हम लोग यूनिट की गाडी से वैष्णव देवी के दर्शन करने गए ! वैष्णव देवी के दर्शन करने का यह हमारा दूसरा अवसर था ! पहली बार सितम्बर १९९३ ई० में जब राजेश अमेरिका जा रहा था, उस वक्त गए थे ! कटरा तक बस और उसके बाद पैदल चढ़ाई, अर्ध कुंवारी और फिर सीधे हम लोग पहुंचे माँ के दरवार में ! १९९३ ई० में पठानकोट में मेरा चचेरा भाई मनोहरसिंह अपने परिवार के साथ रहता था ! एक रात उसके पास रहे थे ! उसी ने हमारे लिए विशेष पास का इंतजाम किया था ! उस समय भीड़ बहुत थी, लेकिन इस समय भीड़ भी कम थी और सारा इंतजाम यूनिट का था ! माँ के दर्शनों के बाद एक और चढ़ाई चढ़ कर हम लोग पहुंचे भैरों मंदिर ! पुराण कहते हैं जब माँ वैष्णव देवी ने भैरों को दंड देने के लिए उसका सर कलम किया तो उसने अपनी आखरी इच्छा बताई थी की "जो भी दर्शनार्थी आपके दर्शन करने आएं वे मेरे मंदिर में भी जरूर आएं और तभी उनकी यात्रा संपन्न समझी जाए" ! माँ ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली ! यूनिट के रेजिंग समारोह की समाप्ति पर हम लोग वापिस दिल्ली पहुंचे ! यूनिट ने मुझे फिर दुबारा बुलाया बटालियन रेजिंग डे पर पहली जनवरी २००६ में ! उस समय यूनिट फैजाबाद आ गयी थी जहां हम लोग बटालियन खडी होने के बाद पहली पोस्टिंग पर गए थे ! वही जामुन के और इमली के पेड़ ! अमरुद के बगीचे, गुप्तार घाट और सरयू नदी के किनारे बगीचे और वट वृक्षों की कतारें ! पुरानी यादें ताजी हो गयी थी ! पहली बार हम उस स्थान पर जौलाय सन १९८१ ई0 से नवम्बर १९८४ ई० तक रहे थे ! सिविल और फ़ौज का ये अंतर है की सिविल से अवकास लेने के बाद दुबारा कोई याद नहीं करता और सेना में रेजिमेंट की यूनिटें अपने सैनिकों को रिटायरमेंट के बाद भी हर साल पीस टाईम पर बुलाती हैं, पुरानी यादें ताजी करवाते हैं और मान सम्मान देते हैं ताकी वे उनके द्वारा की गयी सेवा के लिए गर्व महसूस करें !

Wednesday, August 18, 2010

मेरी कहानी (तेइसवां भाग)

कैलेण्डर की तारीख बदलती गयी, १९९९ हट गया, नए साल के साथ ही २००० ईस्वी यानी इक्कीसवीं सदी ने धरती पर अपने कोमल चरण टिकाए, डरते डरते, क्यों की विश्व इस सदी के आते आते तक इंसान के खुराफाती कार्यों से, इरादों से, आईटम-परमाणु बमों से, विध्वंशक कार्यों से काफी जर्जर हो चुका था ! जंगल कट चुके थे, कृषि भूमि सिमिट कर मल्टी स्टोरीज बिल्डिंगों में तब्दील हो गयी थी ! प्रदूषण का भयानक राक्षस अपनी विषैली शांसों से धरती और आसमान को निगलने जा रहा था ! धरती की पवित्र पावनी नदियाँ गंधे नालों में तब्दील हो चुकी थी ! २००० को आना था सो आ गया ! पाकिस्तान के साथ फिर अटल जी ने दोस्ती का हाथ बढ़ाया, कारगिल की चोट खाने के बाद भी ! लेकिन ढ़ाक के तीन पात, पाकिस्तान अपनी नापाक हरकतों से बाज नहीं आसकता ! फ़ौजी शासक जनरल परवेज मुशर्रफ स्वयंभू राष्ट्रपति बनते ही अपनी जन्म भूमि के दर्शन करने हिन्दुस्तान आया, दिल्ली आया, आगरा का ताजमहल देखा और वापिस पाकिस्तान जा कर वही नफ़रत वाली भाषा में बात करने लगा !
२३ अप्रेल २००० को बड़े बेटे डा० राजेश की शादी हरी नगर वासी श्री शिवसिंह नेगी जी और श्रीमती उमा नेगी की सुपुत्री काजल के साथ की गयी ! शादी बड़े धूम धाम से हुई ! यह परिवार भी पौड़ी गढ़वाल का है ! शिक्षित और सांस्कारिक परिवार है ! अपनी परम्पराएं और सभ्यता से जुडा हुआ है ! परिवार के सारे के सारे अच्छी हैसियत के लोग हैं ! ४ जौलाय २००३ ई० को छोटे बेटे ब्रिजेश की भी शादी कर दी, सागरपुर निवासी श्री कमालसिंह मखलोगा जी की पोती, श्री विजयसिंह मखलोगा जी की सुपुत्री बिन्दू के साथ ! यह परिवार टेहरी गढ़वाल का है ! इतिहास कहता है की मखलोगा जाति के लोग कभी रावलपिन्डी के पुंडीर शासक थे ! मुसलमानों की आवोजाही से इनके पूर्वज वहां से निकल कर टेहरी गढ़वाल में आकर बस गए ! टेहरी राज परिवार से भी इनके सम्बन्ध हैं !
२६ अक्टूबर २००३ ई० को मेरा बड़ा पोता राजेश का पहला पुत्र आत्रेय का जन्म हुआ यूटाह अमेरिका में ! ७ अप्रेल २००५ ई० को मेरी पोती छोटा बेटा ब्रिजेश की लड़की का जन्म हुआ द्वारका दिल्ली में !
८ जून २००७ ई ० को मेरा दूसरा पोता राजेश का दूसरा बेटा वेदान्त का जन्म हुआ न्यू यार्क (मेलविल) में
१६ फरवरी २००९ ई० को मेरा तीसरा पोता ब्रिजेश का पुत्र आर्नव का जन्म हुआ द्वारका दिल्ली में !
२००३ ई० को पहली बार मैं अपनी पत्नी के साथ अमेरिका गया था ! मेरा बड़ा बेटा राजेश उस समय यूटाह (अमेरिका के पश्चिम कोस्ट) में रहता था ! ५ सितम्बर २००३ को दिल्ली एयर पोर्ट से एशियाना एयर लाईन्स से सियोल (साउथ कोरिया) होते हुए लास एंजेल्स एयर पोर्ट पर उतरे, वहां से अमेरिकन एयर लाईन्स से यूटाह पंहुचे ! हवाई यात्रा का पहला अवसर मिला था, यात्रा का भरपूर आनंद लिया ! एक ऐसी पहाडी प्रदेश जिसका पूरा पानी यहाँ की साल्ट लेक (झील) में जमा होता है ! यह लेक बहुत बड़ी झील है और यहाँ के स्थानीय लोग इसके पानी को क्यारियों में जमा करके नमक बनाते है ! यहाँ देखने के लिए बहुत कुछ है ! यहाँ के लोग ईसाई हैं लेकिन ये ईसा मसीह की जगह उनके बाद के गुरु को मानते हैं और इन्हें मारमोन कहा जाता है ! यहाँ हर चार साल बाद विंटर ओलम्पिक का आयोजन किया जाता है ! हैकिंग करने के लिए बड़ी बड़ी पहाड़ियां हैं ! सर्दियों में यहाँ पूरा इलाका बर्फ से ढक जाता है ! यहाँ का सबसे बड़ा शहर है साल्ट लेक सिटी है ! इसके नजदीकी प्रदेश हैं, नेवाडा केलिफोर्नियाँ आदि ! नेवाडा पर्वतीय प्रदेश बिलकुल सूखा एरिया है, लेकिन वहां की प्रांतीय सरकार ने इस इलाके में वेंडसर और लास वेगस जैसे आधुनिक सुख सुविधाओं से युक्त शहर बसा दिए हैं ! वेंडसर एक छोटी सिटी है पर इस सूखे रेगिस्तान में धरती पर स्वर्ग का आभास करताहै ! लेकिन लास वेगस तो विश्व प्रसिद्द कैसिनो का जाना माना नाम है ! १०-१२ मल्टी स्टोरीज होटल्स सुख सुविधावों से युक्त, होटलों को जोड़ने के लिए मिनी रेल हैं ! सरकार जनता ने मिलजुल कर इस प्रदेश को बहुत ही आकर्षक और सुन्दर बना दिया है ! सुन्दर सजा सजाया मार्केट जहां संसार के हर देश का सामान मिल जाता है ! बहुत बड़ी लाईब्रेरी जहां सभी भाषाओं में पुस्तकें उपलब्ध हैं ! यहाँ के लोग बड़े मिलनसार और विदेशों से आये हुए लोगों का सम्मान करने वाले हैं ! वहां दो अंग्रेज परिवार वालों ने हमें डिनर पर भी बुलाया था ! एक रिटायर्ड प्रिंसिपल हमें रोज सुबह की सैर करने पर रास्ते में मिलती थी, वापस इंडिया आते वक्त हुए उस लेडी ने मेरी पत्नी को गले लगाया और एक बड़ी सुन्दर स्वेटर निशानी के तौर पर पहिनाई ! हम लोग करीब पांच महीने यहाँ रहे एक दिन भी बोरियत महसूस नहीं हुआ ! २५ जनवरी २००४ ई० को हम लोग वापिस इंडिया चले गए थे ! एक फ़ौजी रिटायर्ड कभी स्वप्न भी नहीं देख सकता अमेरिका जैसे देशों में जाकर घूमने फिरने का !

Tuesday, August 17, 2010

नायग्रा फाल तक का सफ़र





वैसे अमेरिका के हर कोने में एक आश्चर्य छिपा है, हर प्रदेश कुछ न कुछ विशेषताओं से भरा है! कुछ तो कुदरत मेहरवान है अमेरिका पर फिर कुछ इंसानों ने इसे और संवारा है ! समुद्र के ऊपर भारी भरकम पुल हैं जिनसे एक टापू को दूसरे टापू से मिलाया है तो समुद्र के बीच लम्बी सुरंगे बना कर रेल, मोटर, बस, ट्रक का रास्ता बना दिया है ! कहीं विशाल ह्वेल को अपने बस में करके, उसे ट्रेंड करके प्रयटकों का मनोरंजन करते हैं वहीं दूसरी तरफ विशाल अक्वेरियम के अन्दर इन मच्छलियों को रखते हैं ! विशाल समुद्र के सीने पर हजारों की संख्या में मोटर वोट, पानी के जहाज, पंडुब्बियाँ बड़ी तेज गति से चलती हैं, तो कहीं इम्पायर स्टेट जैसे विशाल मल्टी स्टोरी बिल्डिंग बनाकर ऊंची से ऊंची मंजिल से पूरे न्यू यार्क शहर के साथ साथ अटलांटिक महासागर की लहरों का आनंद भी दिला देती हैं !
२००३ में जब मैं अपनी पत्नी के साथ यूटाह स्टेट में गया था वहां एक रूखे पहाड़ के अन्दर तीन मील लम्बी सुरंग और सुरंग के अन्दर रंग बिरंगे मोम जैसे तरल पदार्थ से कही किस्म की चीजें बनती और गलती हुई देखी ! लास एंजिल्स में पैसिफिक समुद्र के किनारे ऊपर उठती हुई पहाडी, बांसों का जंगल, इस जंगल में हौली हूड़ के मशहूर कलाकारों की विशाल बेशकीमती कोठियां ! केलिफोर्नियाँ, अंगूरों का विशाल वाग, अंगूरों से बनी हुई वाईन ! जहां कुदरत ने पूरी संपदा बिखेर कर इसको सुन्दर बनाया है वहीं अमेरिका की जनता ने तथा विश्व के विभिन्न देशों से आये हुए लोगों ने इसको संवारने में पूरा योगदान दिया है !
नायग्रा फाल
जब भी अमेरिका आता था, नायग्रा फाल के बारे में सुनता था ! बड़ी बड़ी नदियाँ जब पहाड़ की ऊंचाई से गिरती हैं तो झरना या प्रपात कहलाता है ! सोचता था की शायद ऐसे ही होगा नायग्रा फाल भी ! यहाँ न्यू यार्क से हर सोमवार, बुद्धवार और शनिवार को चाईना टाउन से बस चलती हैं ! मेरे बेटे राजेश ने "गोटुबस" नामक एजेंसी की बस में तीन टिकेट बुक करदी थी ! मैं मेरी पत्नी जयन्ती देवी और ध्योता करण नेगी के लिए ! शनिवार के दिन १४ अगस्त २०१० सुबह ६ बजे राजेश हमें कार से क्वींस शेराटन होटल के सामने न्यूयार्क सिटी के नजदीक छोड़ आया ! यहाँ से ७ बजे एजेंसी की बस हमें चाईना टाउन ८७ बौबेरी (मैनहट्टन ) ले आया ! ठीक ८ बजे यहाँ से हमारा सफ़र शुरू हुआ बस नंबर
बी क्ष ७४८४ से नायग्रा फाल के लिए ! सुरंग पार करते ही न्यू जर्सी पहुंचे, यहाँ से आगे का रास्ता बिलकुल क्लीयर मिला ! ज्यादा से ज्यादा स्पीड ६५ मील प्रति घंटे की चाल से बस स्पीड को बनाए हुए थी ! कोई लाल बती नहीं, हर क्रोस्सिंग पर फ़्लाइओवर थे ! रास्ते में घंने जंगल, उठते हुए पहाड़ियों की श्रृंखलाएं, लम्बे चौड़े घास के मैदान, लहलहाते हुए खेत, छोटे छोटे सुन्दर मकानों की बस्तियां, नाले, झीलें चरागाहों में घास चरते हुए किसानों के मवेशी ! मौसम साफ़ था, बस एयर कंडीशंड थी, इसलिए यात्रा में जहां कुदरत साथ दे रही थी वहीं मौसम का मिजाज भी शांत था !


रेस्ट एरिया पेंसिलवेनिया में रुके, चाय ली और आगे के लिए प्रस्थान किया ! बस में हम सारे यात्री बच्चों सहित ५७ थे ! हिन्दुस्तानी ज्यादा थे अंग्रेज कम थे ! ड्रावर अफ्रीकन अमेरिकन था तो कंडक्टर वनाम गाइड चाईनीज थी ! नाम था मैगी ! गाइड वास्तव में काफी होशियार, जानकार, मददगार थी ! पूरी यात्रा के दौरान वह सब मुसाफिरों का ध्यान रख रही थी, हर स्थान के बारे में जानकारी दे रही थी ! चहरे पर हर समय कुदरती मुस्कान थी ! रास्ते में छोटे छोटे कस्बे आते गए, जैसे न्यू म्यल फोर्ड कोर्ट लैंड, हैण्डरसन हार्बर, इंडियाना रिवर लेक, कोलंबिया, देल्वारे आदि ! दिन के ३ बजे हम लोग अलेक्सजेनडरिया बे (लोवर जेम्स स्ट्रीट ड़ैक )पहुंचे ! यहाँ पर बोट का सफ़र ! इस बोट का नाम था "अंकल साम बोट टूर " इसमें १५० से २०० पर्यटक एक साथ सफ़र कर सकते हैं ! इस समुद्र का नाम है सैंट लारेंस रिवर, इसकी खोज सन १५३५ ई० में जैक़ुईस कार्टियर ने की ! इस से कनाडा और अमेरिका का समुद्री रास्ता खुल गया ! इस इलाके का सबसे पहले माना जाने वाला चार्ट बना १६८७ ई० में जें देस्बयेस द्वारा और इसका नाम पड़ा १००० ऐलैंड । इस समुद्र में कनाडा और अमेरिका (न्यू यार्क ) के बीच में १८६४ छोटे बड़े ऐलैंड हैं ! हर टापू में अच्छे खूबसूरत लाज, हट, चर्च या बड़े टापुओं में
सुन्दर मकान या होटल बने हुए हैं ! पर्यटक समुद्र के बीच में रुक कर यहाँ इन टापुओं में मनोरंजन करने के लिए रुक जाते हैं ! कुछ टापू इतने बड़े हैं की यहाँ होटल व्यवस्था भी है और पर्यटक एक या दो दिन यहाँ रुक भी सकते हैं ! एक घंटा इन टापुओं का चक्कर लगाने के बाद हम लोग पांच बजे चल पड़े अगले पड़ाव की तरफ ! बफेलो सिटी नायग्रा फाल पहुंचे रात के १० बजे ! यहाँ बफेलो यूनिवर्सिटी भी है ! नायग्रा नदी कनाडा और न्यू यार्क, अमेरिका को बांटती है ! यहीं रात को हमें नायग्रा फाल दिखाया गया ! सामने कनाडा से रोशनी पड़ती है झरने के ऊपर ! इस पार से कनाडा की मल्टी स्टोरीज बिल्डिंगें, अम्बेसीज, होटल, कैसीनों के बोर्ड नजर आ रहे थे ! रात काफी हो चुकी थी इसलिए होटल रेस्तां बंद हो चुके थे, रात के एक बजे कोम्फोर्ट सुइटेस (होटल) पहुंचे ! काफी आराम दायक सभी सहूलियतें थीं, मजे से रात कट गयी ! सबेरे ७ से साढ़े सात बजे तक यहीं होटल में ब्रेक फास्ट (नास्ता) किया और आठ बजे चल पड़े नायग्रा फाल की तरफ ! आसमान बादलों से ढका हुआ था, कभी कभी हल्की सी बूंदा बांदी भी पड़ रही थी ! बादल नए नए फोरमेशन बनाते और हवाओं के झोंखों से फिर बिखर जाते ! बोटिंग के लिए काफी लम्बी लाईने लगा थी, हमारी गाइड ने ही हम सब लोगों का टिकट लिया और हम अन्दर चले गए! ये नायग्रा फाल ऑथोरिटी का कार्यालय था ! यहाँ से लिफ्ट से नीचे नदी के किनारे पहुंचे ! यहाँ पर बड़ी बड़ी बोटें लोगों को झरने के बिलकुल नजदीक ले जाती हैं ! हमें रेन कोट दिए गए, ताकी झरने की तेज बौछारों से बचा जा सके ! हम करीब १५० लोग बोट में सवार हुए, बोट आगे बढ़ती हुई नायग्रा फाल की तरफ चली ! यहाँ पर दो प्रपात हैं, एक तो अमेरिका की तरफ है "स्माल ब्रैडल फाल", दूसरा बड़ा फाल जिसका एक हिस्सा अमेरिका में पड़ता है और दो हिस्से कनाडा में ! इस को "हौर्स शू फाल" कहते हैं क्यों की इसका आकार बिलकुल घोड़े की नाल जैसे ही है! नायग्रा नदी यहाँ दो भागों में बंटी है इस बीच के इलाके को (दोनों झरनों के बीच) गौट ऐलैंड कहते हैं ! दोनों झरनों को जो अलग करती है उस स्थान को लुना ऐलैंड कहते हैं !


झरना की ऊंचाई ८६ फीट है (२६ मीटर) ! चौड़ाई भी बहुत है, हर मिनिट में इस झरने से ६ मिलियन क्यूबिक फीट पानी गिरता है ! हमारी मोटर बोट हमें झरने के बिलकुल नजदीक तक ले गया ! पूरा चक्कर लगा कर के हम वापिस आगये ! विश्व का एक अजूबा ! एक रिपोर्ट के मुताबिक़ सन १८४८ ई० में एक ऐसा दिन भी आया जिस दिन नायग्रा नदी में पानी न होने से यह झरना ४० घंटे तक सुखा रहा ! इसके बाद हमें इसी नायग्रा फाल के ऊपर ४० मिनिट की एक मूवी दिखाई गयी ! कहते हैं कम से कम १०,००० हजार साल पहले जब हिम युग था सारी धरती हिमाच्छादित थी, जब बर्फ पिघलने लगा तो एक झील बनी जिसका नाम रखा गया "ग्रेट लेक " ! इसी से नायग्रा नदी निकली बड़ी बेग से और आगे चल कर इसी नदी पर यह विश्व प्रसिद्द "नायग्रा फाल " बना ! पिक्चर में १०००० साल पुराने लोगों की जीवन शैली दिखाई गयी है, एक जवान लड़की की शादी पुरोहित एक बूढ़े आदमी से कर देता है, लड़की भाग जाती है और नाव में बैठ कर नायग्रा नदी को पार करना चाहती है, लेकिन नाव इस झरने से नीचे गिर जाती है और वह मर जाती है, फिर उस झरने के नीचे उसकी आत्मा को दिखाया गया है एक सिम्बल के तौर पर ! इस जग प्रसिद्द प्रपात की खोज करने में, इस तूफानी नदी में अपनी मोटर बोट से जीवन मृत्यु का खेल खेलने वाले कुछ और भी वीरों की गाथा इस प्रपात से जुडी हैं ! किस तरह पहले एक वीर दिलेर नाविक ने इस नदी में नाव या जहाज चलाने की कोशीश की उन्हें कितनी कठनाइयों का सामना करना पड़ा इसे भी इस लघु फिल्म में दिखाया गया है ! सन १९६१ ई० में तीन लोग मिंया बीबी और साथ में १४ साल का लड़का मोटर बोट में सैर कर रहे थे, अचानक इंजिन बंद हो गया और नदी के तेज बहाव में नाव उलट गयी, तीनों बहने लगे आदमी तो तैर कर बाहर आगया, औरत को भी बचा लिया गया, लेकिन बच्चा उस झरने की चपेट में आ गया और झरने के तेज बहाव में नीचे आ गया ! कुदरत का करिश्मा देखिये बच्चा जीवित रोता, चिल्लाता हुआ, उस मौत की घाटी से बाहर नदी में तैरता हुआ मिला, मोटर बोट वालों को, जो वहां मोटर बोट का आनंद ले रहे थे! उन्होंने ने उसे रस्सी से खींच कर बोट में लिटा लिया, उसके पेट का पानी निकाला और उसे उसके माँ बाप को सौंप दिया ! माँ-बाप तो बेचारे रो रो कर बेहोश से हो गए थे, इस चमत्कार से उन्हें कितनी खुशी मिली होगी, कहने के लिए शब्दों की कमी हो जाएगी ! इस मूवी में यह भी दिखाया गया की एक बुजुर्ग औरत की ख्वाईस पूरी करने के लिए उसे एक गोल काठ की बड़ी हंडिया में बंद करके नदी में छोड़ दिया जाता है, वह बहते बहते उस झरने से भी नीचे गिर जाती है ! नीचे आने पर लोगों ने उस हंडिया को खोल कर देखा तो वह बुजुर्ग औरत और उसके साथ की बिल्ली दोनों जीवित थे ! मूवी देखते हुए ऐसा लग रहा था की हम एक हेलीकौफ्टर में बैठे हुए हैं और वह नायग्रा फाल की तरफ बड़ी तेजी से जा रहा है बिलकुल सामने
. ! यह नदी कल कारखानों को बिजली मुहया कराने में भी मददगार है ! इसी के कारण यहाँ लाखों लोगों की रोजी रोटी चलती है ! होटल हैं, रेस्टोरेंट हैं, बहुत बड़ी मार्केट है, रेल, बसे, कारें, नाव, बोट, जहाज इस नदी और झरने की देन है ! सारे नायग्रा फाल संबधी जानकारी लेने के बाद १५ अगस्त (भारत में स्वतंत्रता दिवस) दिन के एक बजे हम लोग वापिस चल पड़े मैनहटन न्यू यार्क के लिए ! न्यू जर्सी के बाद जाम लगने की वजह से चाईना टाउन ११ बजे के लगभग पहुंचे ! वही बस हमें क्वींस ले गयी वहां राजेश इन्तजार कर रहा था, घर ब्रेटल सर्कल मेलविल (लॉन्ग ऐलैंड) पहुंचते पहुंचते रात के १२ बज चुके थे ! ये थी हमारी नायग्रा फाल की यात्रा ! "समाप्त"

Monday, August 16, 2010

उड़न तश्तरी ....: मुद्दतों बाद….

उड़न तश्तरी ....: मुद्दतों बाद….
मैंने उन्हें सर झुका के नहीं सर उठाके देखा
चुनाव हार गए थे फिर भी मुस्कराते देखा,
पूछा आखिर राज क्या है भाई , इस मुस्कान का ,
हंसते हंसते ही कहा,
"चुनाव ही तो हारा हूँ, जिन्दगी तो नहीं,
वोट तो फिर भी मिल जाएंगे, यहाँ नहीं कहीं और सही !
इसलिए हंसता हूँ, मुस्कराता हूँ,
जो झूट बोलता हूँ, इस मुस्कान से उसे छिपाता हूँ,
जनता को इसी मुस्कान से फंसाता हूँ,"
कहते हुए, गरदन उठा के देखा,
आँखों में क्रूरता झलक रही थी,
उड़न तस्तरी को मुद्दतों बाद देखा !

Thursday, August 12, 2010

मेरी कहानी (बाईसवां भाग)

समय की गाडी बड़ी तेज गति से चल रही थी ! मेरी लड़की उर्वशी ने अब नेहरू प्लेस की एक एडवरटाईज्मेंट एजेंसी में जॉब करना शुरू कर दिया था ! ३ मार्च सन १९९० ई० को हमने उर्वशी की शादी श्री दयालसिंह नेगी जी के सुपुत्र राजेन्द्र सिंह नेगी के साथ कर दी ! यह परिवार बदलपुर पट्टी पौड़ी गढ़वाल का है ! हमारे समधी जी चार भाई हैं इनका एक बड़ा भाई सेना में सूबेदार थे और उन्होंने द्वितीत विश्व युद्ध में भाग लिया था ! श्री दयालसिंह जी भी सेना में थे लेकिन उन्होंने जल्दी ही डिस्चार्ज ले लिया था, केन्द्रीय सरकार ने उन्हें सर्विस में ले लिया था और इस समय पेंशन ले रहे थे सं १९९७ ई0 में वे बीमार हुए और ६७ साल की उम्र में स्वर्ग सिधार गए ! ये एक जिंदादिल इंसान थे, शरीर से भी और दिमाग से भी स्वस्थ और मजबूत थे ! हंसता हुआ चेहरा, दोस्तों के दोस्त, जिन्दगी को बोझ बनाकर नहीं, जिन्दगी को अपने तरीके से जीने वाले साफ़ दिल के इंसान थे ! उनके जाने से हमने एक सच्चा हम सफ़र खो दिया ! इनके पिता जी श्री कल्याणसिंह जी जंगलात विभाग में अधिकारी थे ! उन्होंने बदलपुर के जंगलों में पेड़ों की एक नयी किस्म की खोज की और पूरे इलाके में इस नए किस्म के पेड़ की पौध लगाई ! इसकी विशेषता यह है कि यह पेड़ सीधा ऊंचाई की तरफ बढ़ता है, घन्नी पतियों से आच्छादित इमारती लकड़ियों का खजाना है ! यह आक्सीजन की मात्रा भी ज्यादा देता है ! इस अनुसंधान के लिए सरकार ने उन्हें राय बहादूर के खिताब से अलंकृत किया और मचकाली कुमायूं में पारितोषिक तौर पर जमीन आवंटित की ! ३ दिसम्बर १९९० ई० को हमारा ध्योता करण का जन्म हुआ और मैं और मेरी पत्नी नाना नानी बने ! पहली फरवरी १९९२ को उर्वशी ने जॉब बदली किया और शाव वालेस कंपनी ज्वाइन की जो बाद में यू बी के नाम से जाने जानी लगी ! अब तो मेरी बेटी ने इन्द्रा गांधी ओपन यूनिवर्सिटी से एम बी ए भी कर लिया है और मैनेजर की पोस्ट का इन्तजार कर रही है ! सन १९९२ ई० मार्च के महीने में राजेश को भी आई आई टी से डिग्री मिल गयी थी ! इस समारोह में मैं भी गया था ! राजेश ने एक साल के लिए इंडिया में ओ एन जी सी कंपनी ज्वाइन की और सितम्बर १९९३ ई० में अमेरिका की यूटाह स्टेट यूनिवर्सिटी में दाखिला ले लिया ! यहीं से उसने १९९८ ई० में केमिकल इंजीनियरिंग में पी एच डी की डिग्री हासिल की और वहीं यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर की पोस्ट पर रिसर्च करने लगा ! २४ अगस्त १९९३ ई० को नीतिका का जन्म हुआ ! साथ ही उर्वशी ने पटपड़गंज में अंकुर अपार्टमेन्ट में अपना मकान ले लिए ! दिसम्बर १९९४ ई० में भविष्य निधि संगठन ने दिल्ली रीजनल कार्यालय की दो ब्रांच और खोल दी एक पूर्वी दिल्ली लक्ष्मी नगर में और दूसरी डिस्टिक सेंटर जनकपुरी में ! मैंने अपनी पोस्टिंग यहीं जनकपुरी में करवा ली ! २६ जनवरी १९९५ ई० को पठानकोट में मेरी चाची कुंवारी देवी का स्वर्गवास हुआ, वे उस समय अपने जेष्ट पुत्र कैप्टेन मनोहरसिंह रावत के पास रह रही थीं ! ३१ जनवरी १९९६ ई० को मुझे भविष्य निधि कार्यालय से भी अवकास मिल गया ! कार्यालय के साथी मुझे घर तक छोड़ने आये थे ! सन १९९७/९८ को मैंने जीवन पार्क में एक नया डब्बल मंजिल मकान बनाया ! इस समय तक जीवन पार्क की कॉलोनियां पूरी तरह भर गयी थी ! ३ नवम्बर १९९८ ई० को मेरे निवास स्थान में मेरी माँ ने आखरी सांश ली और स्वर्ग सिधार गयी ! सन १९९६ ई० का संसद का चुनाव चौंकाने वाला सिद्ध हुआ ! किसी भी पार्टी को सपष्ट बहुमत नहीं मिला ! खिचडी सरकार का प्रधान मंत्री बने
एच डी देव गावडा ! ये सरकार भी ज्यादा दिन नहीं चली और १९९८ ई० को संसद के नए चुनाव हुए और भा ज पा सरकार बनाने में कामयाब रही ! श्री अटल बिहारी बाजपेयी प्रधानमंत्री बने ! इससे पहले भी १९९६ ई० में अटल जी १३ दिन के लिए प्रधान मंत्री बने थे ! सन १९९९ ई० में संसद में सरकार एक वोट से अल्पमत में हो गयी, और १३ महीने बाद ही दुबारा अटल जी को त्याग पत्र देना पड़ा ! लेकिन चुनाव में जीत फिर बा ज पा की ही हुई और अटल बिहारी बाजपेयी जी ने तीसरी बार प्रधान मंत्री के पद के लिए सपत ली ! इन्हीं दिनों पाकिस्तान के आतंक वादियों ने अपनी सेना के साथ कारगिल की चोटियों में हमारी सीमा के अन्दर अपने मोर्चे बनाकर वहां कब्जा जमा दिया ! कारगिल युद्ध हुआ, भारतीय सैनिकों ने काफी कुर्वानी दी लेकिन घूस-पैठियों को सीधे यम लोक पहुंचा दिया और पाकिस्तान को फिर हरा कर उसके मनसूबों पर पानी फिरा दिया ! पाकिस्तान में फिर से मिलिटरी ने सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया ! परवेज़ मुशर्रफ फ़ौजी राष्ट्रपति बने, उन्होंने ने ही ये कारगिल युद्ध करवाया तथा पाकिस्तानी सेना को भी इस युद्ध में शामिल किया ! विश्व के कही देशों ने पाकिस्तान के इस कुकृत्य के लिए उसकी निंदा की ! जीत भारत की ही हुई लेकिन सेना के कही रत्नों को खोने के बाद ! राज रिफ की दूसरी बटालियन ने इस युद्ध में काफी वीरता का काम किया और शहीदों ने 9 महावीर चक्र और कही वीर चक्र अपनी बटालियन व रेजिमेंट को दिए ! दो सिपाईयों को मरणोपरांत परमवीर चक्र दिए गए एक ग्रेनेडियर का योगेन्द्र सिंह यादव और दूसरा जे एंड के रेजिमेंट का था सिपाही संजय कुमार ! लेकिन बाद में पता चला की वे दोनों ज्यादा जख्मी थे और बाद में होश में आगये थे ! आज दोनों अपनी बटालियनों में जे सी ओज होंगे ! ले.मनोजकुमार, १/११ गोरखा राईफल्स, कैप्टेन विक्रम वत्रा १३ जे & के स्क्वेड्रन लीडर अजय आहूजा एयर फ़ोर्स तीनो को मरणोपरांत परमवीर चक्र से अलंकृत किया गया !

Wednesday, August 11, 2010

मेरी कहानी (इक्कीसवां भाग )

मेरे पर दादा श्री चैतसिंह जी के तीन भाई शेखर और दो का नाम नहीं जानता मालन नदी के किनारे क्यार्क नामक गाँव में जाकर बस गए थे ! उनके लड़के गोपाल, मगनसिंह को मैं जानता था ! मालन नदी के किनारे एक बड़ा मैदान है जिसका नाम मैरवानखेत ' है और वहीं पर नदी से नहर निकाल कर एक पन चक्की लगा रखी है, ये पनचक्की उन्हीं मेरे भाई बंधों की है जिनके पूर्वज हमारे गाँव से चले गए थे ! यहाँ गाँव में एक भाई और रह गया था, उनका नाम था संग्रामसिंह ! उनके दो बेटे हुए, गौर सिंह और औतार सिंह ! औतारसिंह सेना में नौकरी करते थे और उन्होंने दूसरे विश्व युद्ध में हिस्सा लिया था ! विश्व युद्ध की समाप्ति पर उन्हें सेना से मुक्त कर दिया गया था ! वे दमा के मरीज थे ! उनके दो लड़के थे रघुबीर सिंह जो २४, २५ साल के अन्दर ही स्वर्ग सिधार गए थे, उनकी कोई संतान नहीं थी ! दूसरे लड़के का नाम था गुमानसिंह ! इन्होंने मध्य प्रदेश की पुलिस फोर्स (एस ए एफ ) में सर्विस की और पेंशन लेकर अपने गाँव में खेत खलियान की देख भाल करने लगे ! घर आते ही बीमार रहने लगे और ६०-61 साल की उम्र में ही वे भी यह संसार छोड़ कर दूसरे संसार में चले गए ! उनका लड़का रवि रावत भी एस ए एफ में सेवारत है ! दो लड़कियां हैं जिनकी शादी हो चुकी हैं और वे अपने ससुराल में हैं ! गौरसिंह के पुत्र थे गंगासिंह ! गौर सिंह अपनी पूरी उम्र जीकर सन १९६० ई ० में मृत्यु को प्राप्त हुए ! गंगासिंह के पांच लड़के और तीन लड़कियां हुई ! सन १९७६ ई 0 में उन्होंने भी इस शरीर को छोड़ मृत्यु का आलिंगन किया ! बड़े लड़के का नाम था मानसिंह ! गाँव में सबसे पहले पौखाल मीडिल स्कूल तक यही गए थे ! अच्छी कद काठी के थे भाई मानसिंह जी, लेकिन दुबले पतले मुंह पर एक कुदरती हंसी रहती थी ! इन्होंने आंध्र प्रदेश में जाकर नौकरी की ! मैं इनकी काफी इज्जत करता था ! लेकिन पता नहीं वो कौन से कारण थे की गांवमें केवल तीन परिवार रहने के बावजूद ये लोग मिल जुल कर नहीं रह पाते थे ! हमेंशा झगडा, कभी खेतों के लिए तो कभी घास लकड़ी के लिए ! फिर भी भाई मानसिंह से मैंने बहुत कुछ जानकारी प्राप्त की अपनी फॅमिली ट्री के बारे में ! हमारे पूर्वज काली कुमायूं आये थे वहां से बड़े देवता कैंतूर के नाम का त्रिशूल लेकर गढ़वाल आये थे, वहा चित्र शिला नामक एक मैर्वानों का पवित्र स्थान है, ये सारी जानकारी मुझे भाई मानसिंह जी ने ही दी थी ! वे जानते थे की मैं जो उनसे ज्यादा पूछ ताछ कर रहा हूँ इस परिवार की कहानी लिखने के लिए कर रहा हूँ ! उनके तीन लड़के और चार लड़कियां हुई ! लडके खुशी रावत, राज रावत और बुद्धीसिंह रावत हैं और एक आंध्र प्रदेश में और दो दिल्ली में सर्विस कर रहे हैं ! वे भी ७० उम्र पार कर के स्वर्ग सिधार गए ! उनसे छोटा भाई है दयालसिंह, वह भी राज रिफ की १७ वीं बटालियन में सर्विस करके पेंशन आ गया है ! उसके चार लड़के हैं रमेश, दिनेश, जगदीश और जगदेव ! रमेश जंगलात डिपार्टमेंट में सेवारत है, दिनेश एस ए यफ में और जगदीश आर्मी में सेवारत है और नायब सूबेदार बन गया है ! अमरसिंह, पंचम सिंह गाँव से बाहर चले गए हैं, और परिवार के साथ वहीं बस गए हैं ! प्रेमसिंग ने गढ़वाल राईफल्स में नौकरी की है ! उसके भी चार लड़के हैं, राजेन्द्र, जीतेंद्र, पन्ना, और भारत ! जीतेंद्र और भारत गढ़वाल राईफल्स में सेवारत हैं ! राजेन्द्र घर में ही घर के काम करता है ! पन्ना पौखाल में दुकान चलाता है ! गाँव में केवल यही परिवार रहता है, दयाल और हम लोग साल के गर्मियों में कुछ दिनों के लिए ही गाँव जा पाते हैं ! सचीन रावत, पपेंद्र मेरे भतीजे बराबर माँ को देखने के लिए गाँव जाते रहते हैं !
गाँव में अब घास है लकडियाँ काफी मात्रा में हैं लेकिन उनको उपयोग करने वाले कम है ! आस पास के गाँवों में मोटर मार्ग बन गए हैं लेकिन हमारे गाँव में सड़क कागजों में तो आ गयी है पर असल में नहीं आई ! खेती, खेत बंजर पड़े हैं इनमें बन्दर दौड़ लगाते हैं और प्राय: कबड्डी खेलते हैं !

Tuesday, August 10, 2010

मेरी कहानी (बीसवां भाग )

सिविल की ओर
सन १९८५ में मेरे बड़े बेटे राजेश ने १० वीं अच्छे नंबरों से पास कर ली थी, उर्वशी ने भी १२ वीं पास करके बी ए में दाखिला ले लिया था ! ब्रिजेश सातवीं क्लास में पढ़ रहा था ! मैं नयी पेंशन आने से दो महीने पहले पेंशन आ गया था इसलिए नयी पेंशन का लाभ मुझे नहीं मिला ! साथ ही अभी तक सरकारी मकान में रहा था, पेंशन आने के बाद मकान खाली करना था, सेना का चाहे वह ऑफिसर है चाहे जे सी ओज चाहे सैनिक वह सेना से अवकास लेते ही सरकारी मकान खाली कर देता है ! मैंने भी खाली कर दिया ! सेना एक अनुशासित सच्चा देश प्रेमी होता है ! जब तक सर्विस पर रहता है, सीमा पर तैनात रहता है, सीमा की रक्षा पर ! देश की एक इंच जमीन के लिए अपने को ही कुर्बान कर देता है ! पूरी जवानी अनुशासन, वफादारी, ईमानदारी, देश की सुरक्षा करने में गुजर जाती है ! सिविल में ८ घंटे की ड्यूटी होती है, लेकिन सेना में सैनिक २४ घंटे ड्यूटी पर तैनात रहता है ! लेकिन उसकी ऑथोरिटी तो पुलिस के कांस्टेबल के बराबर भी नहीं होती ! एक पुलिस का आदमी एक साल की नौकरी में एक मोटर साईकिल खरीद लेता है पांच साल में एक कार और दश साल में एक फ्लेट का मालिक बन जाता है ! एक सेना का जे सी ओज २८ साल में भी एक स्कूटर नहीं खरीद पाता ! सिविल का क्लर्क रिटायर्ड होने के बाद भी सरकारी मकान पर सांप की तरह कुण्डली मार कर बैठा रहता है और कोई उसे हटाता भी नहीं है, लेकिन फ़ौजी ऐसा कभी नहीं करता ! बच्चे अभी पढ़ रहे थे, इस लिए दिल्ली छोड़ भी नहीं सकता था ! एक छोटा सा किराए का मकान लिया ! २८ साल का भविष्य निधि का पैसा व् ग्रेच्युटी के पैसों से एक सौ गज का प्लाट लिया और उस पर दो कमरों का एक मकान बनाया ! बच्चों को नए मकान में शिफ्ट कर दिया ! अब नौकरी ढूँढने में लग गया ! उन दिनों सिविल में अच्छी नौकरी मिलना आसान नहीं था ! काफी दौड़ धूप करता रहा ! डेढ़ साल के लिए भूतपूर्व सैनिक लीग के कार्यालय में काम करने का मौक़ा मिला ! लीग में उस समय अध्यक्ष थे अवकास प्राप्त ब्रिगेडियर रामसिंह ! लीग के शीर्ष पर स्वतंत्र भारत के प्रथम सेनाध्यक्ष फील्ड मार्शल के एम करिअप्पा थे ! उन्हें २६ जनवरी १९८७ ई० को अशोका हौल राष्ट्रपति भवन में, उस समय के राष्ट्रपति श्री ज्ञानी जेल सिंह जी द्वारा फील्ड मार्शल के रैक से नवाजा गया ! मुझे भी उस दिन अशोका हौल में जाने का अवसर मिला ! ३१ जौलाय १९८७ को भूतपूर्व सैनिक लीग का कार्यालय से भी जबाब मिल गया था ! अब फिर नौकरी ढूँढने का सिलसिला शुरू होगया था ! राजेश ने १२ वीं कर लिया था और आई आई टी की तैय्यारी करने लगा गया था ! वह अपने आप ही आई आई टी की सामग्री मंगाता था, कोचिंग भी स्वयं ही करता था, उसकी मेहनत रंग लाई और १९८८ ई० को उसे आई आई टी दिल्ली में दाखिला मिल गया ! कितनी खुशी हुई थी पूरे परिवार के लोगों को उस दिन, बयान से परे है ! लगा जैसे बजरंगबली ने साक्षात दर्शन देकर हमारी मुरादें पूरी कर दी ! उर्वशी ने भी दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन कर लिया था ! इसी साल गाँव में मेरे चचेरे भाई मनोहरसिंह (बंगाल इंजीनियर कोर में कैप्टेन था) ने बड़े देवता की बड़ी पूजा का आयोजन किया था ! यह पूजा शायद २०-२५ सालों बाद हुई थी ! इस पूजा में परिवार के सभी सदस्य सामिल थे !
मेरी माँ, चाची काफी दिनों बाद मिले थे !
२५ जनवरी १९८९ को मुझे भविष्य निधि कार्यालय नेहरू प्लेस में लिपिक की जगह मिल गयी ! यहीं यूनियन के चुनाव में जीत कर, यूनियन का सदस्य बन गया, इससे न केवल कर्मचारियों के संगठन को मजबूत करने का दायित्व निभाया, बल्की उनकी सुख सुविधाओं और मांगों को अधिकारियों तक पहुंचाकर उन पर विचार करने के लिए भी निवेदन करने का दायित्व निभाया !
राजनीति में इन दिनों बड़ी हल चल रही, सन १९८४ ई० के चुनावों में राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को संसद में दो तिहाई बहुमत मिला, राजीव गांधी फिर से प्रधान मंत्री बने, सबसे कम उम्र के प्रधान मंत्री ! विश्व नाथ प्रताप सिंह रक्षा मंत्री बने ! इन्हीं दिनों राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच कुछ तन तनाव का माहोल बना रहा ! ऊपर से बौफर्स गनों की खरीद फरोख्त में दलाली खाने का मामला सामने आया ! राजीव गांधी की मुसीबतें बढ़ गयी ! इस मामले ने इतना तूल पकड़ा की लगा संसद में भूकंप आ गया हो ! १९८९ का चुनाव में यह मुद्दा छाया रहा और कांग्रेस हार गयी ! विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इसी मुद्दे पर कांग्रेस छोडी और १९८९ ई० में जनता दल की सरकार में प्रधान मंत्री बने ! देवी लाल उप प्रधानमंत्री व् गृह मंत्री बनाए गए ! यह सरकार ज्यादा नहीं चल पाई और सता और कुर्सी की छिना झपटी में वी पी सिंह को त्याग पत्र देना पड़ा, उन्होंने जाते जाते मंडल कमीशन का बण्डल खोल कर, बुझी हुयी आग को हवा दे दी ! इस अग्नि में कही किशोर या तो मर गए या अपाहिज हो गए ! वी पी सिंह को इस दुर्घटना के लिए याद किया जाता है जो उन्होंने केवल अपनी कुर्सी बचाने के लिए किया था ! चन्द्र शेखर को अगला प्रधान मंत्री बनाया गया, उन्होंने एक बार संसद में राजीव गांधी की मदद से अपना बहुमत तो सिद्ध कर दिया लेकिन इस खिचडी सरकार को ज्यादा दिन खींच नहीं पाए और १९९१ आते आते उनहोंने भी त्याग पत्र देकर अपना पीछा छुडाया ! 1991, २१ मई का दिन एक काला दिन बन कर आया और उभरते एक नव जवान, भारत के होनहार योग्य भविष्य के प्रधान मंत्री राजीव गांधी को छीन कर ले गया ! एक सर फिरे एल टी टी ई के आतंकवादी महिला ने आत्मघाती बम से उन्हें मृत्यु की गोद में सुला दिया ! इस चुनाव में राजीव गांधी की ह्त्या, जनता की कोमल भावनावों को छेड़ गयी और कांग्रेस को संसद में बहुमत दिला गयी ! मई १९९१ का महीना बड़ा ही मन हूश महीना था, मेरा चहेरा भाई सुरेन्द्रसिंह ३८ साल की उम्र में ही हम लोगों को छोड़ कर चला गया ! एक खुले दिल से हंसने हंसाने वाला हंस मुख भाई, कवि ह्रदय परिवार के सारे सदस्यों को मिलाने वाली मजबूत कड़ी, अचानक हमसे बिछुड़ गया ! बचपन में उसने भी तो कष्ट उठाए थे, अच्छी बुद्धी और होशियार, चतुर था ! दिल्ली से ही बी ए करके एस एस सी टेस्ट पास करके रक्षा मंत्रालय में लिपिक की पोस्ट पर नियुक्ती हुई थी और अपनी प्रखर बुद्धी और मेहनती होने से जल्दी ही वह सेक्शन ऑफिसर की पोस्ट तक पहुँच गया था ! लेकिन ईश्वर को यह खुशी राश नहीं आई और वह इतना ज्यादा अच्छा था की भगवान् को भी उसकी सेवाओं की जरूरत महसूस होने लगी और उन्होंने उसे अपने पास बुला लिया !
नरसिंघा राव प्रधान मंत्री बनाए गए और वित् मंत्री बने सरदार मन मोहनसिंह ! देश की माली हालत बहुत ख़राब हो चुकी थी ! चन्द्र शेखर ने देश की वित्त व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए देश का सोना ही वर्ड बैंक में गिरवी रख दिया था ! वर्ड मार्केट में देश की शाख काफी गिर गयी थी ! विदेशी करेंसी का पतिशत काफी नीचे गिर गया था ! मन मोहन सिंह जी ने नयी उदार नीति अपना कर अर्थ व्यवस्था को सम्भाला और विदेश से गिरवी सोने को देश में वापिस मंगवाया ! उन्होंने विदेशी कंपनियों के लिए गेट वे आफ इण्डिया का दरवाजा खोल दिया ! बड़ी संख्या में विदेशी कम्पनियां यहाँ आने लगी और देश के नव जवान जो अपनी योग्यता से विदेशों में जाकर पैसा और सौहरत हासिल करना चाहते थे, वह उन्हें यहीं भारत में ही मिलने लगा ! नरसिंघा राव तो एक अच्छे प्रधान मंत्री का सेहरा तो नहीं बाँध पाए पर सरदार मन मोहन सिंह जी का राजनीतिक कद काफी बढ़ गया ! उनकी सूझ बूझ और अच्छी अर्थ नीति के कारण विदेशों में भारत की शाख फिर से अपना स्थान बनाने में कामयाब रही ! वे देश में ही नहीं बल्की विदेशों में भी एक सफल अर्थ शास्त्री वित्त मंत्री के तौर पर जाने पहिचाने लगे !

भारत - श्रीलंका क्रिकेट टेस्ट सीरिज

आइये एक नजर इधर भी डालिए, क्या किया है हमारे शेरों ने श्री लंका में जाकर ! पहला टेस्ट श्रीलंका ५२०/८ + ९६/० और भारत २७६ + ३३८। यह मैच भारत १० वेकेट से हारा ! वीरेंद्र सहवाग १०९+३१ , लक्ष्मण २२+69, युवराज ५२+५ , धोनी ३३+४ !@ दूसरा मैच श्रीलंका ६४२/४ भारत ७०७ ! इंडिया एक ही इन्निंग खेल पाया ! मुरली विजय गौतम की जगह पर खेला उसने ५८ बनाए, सहवाग ९९, सचिन २०३, (४८ वीं टेस्ट सेंचुरी ) लक्षम २९, रैना का पहला मैच १२०, धोनी ७६ ! मिथुन बौलर ४१, इ शर्मा २७ ! तीसरा मैच श्रीलंका ४२५ + २६७, इंडिया ४३६ +२५८/५ ! भारत ५ विकेट से मैच जीता ! सहवाग की सेंचुरी १०९ रन, सचिन ४१+५४, लक्षम ५६+१०३, रैना ६२+४१, मैच जीतने का श्री सहवाग, लक्षम और रैना को तो जाता ही है पर इसमें बौलारों की अहम् भूमिका रही है ! इश शर्मा ओझा, मिश्रा ! वीरेंद्र सहवाग जहाँ बैटिंग में टीम को लीड दे रहे थे वहीं दो मैचों में एक एक विकेट और तीसरे मैच में ४ विकेट उसी ने लिए ! राहुल द्रविड़ , युवराज, हरभजन, गौतम, टीम पर बोझ बन कर रहे ! धोनी कैप्टेन कामयाब रहा अपनी टेस्ट मैचों की पहली पोजीशन बचाने में ! भारत ने १९९४ के बाद यह आखरी मैच जीता ! + - बराबर रहा ! सचीन के शीने पर एक डब्बल शतक का तगमा और लग गया !

Monday, August 9, 2010

मेरी कहानी (अट्ठारवां भाग)

३१ अक्टूबर १९८४ ई० में हम लोग अपने ऑफिस में डाक के ढेर को शॉर्ट ऑउट करने में जुटे थे, कि अचानक एक जवान भागता हुआ ऑफिस में आया और कहने लगा , "साहेब, एक बड़ी दुःख:दाई खबर है, दिल्ली में प्रधान मंत्री श्रीमती इन्द्रा गांधी को उनके ही गार्ड ने गोली मार दी है ! हालत चिंता जनक है, बचना मुश्किल है !" और कुछ देर के बाद
टी वी न्यूज ने फाईनल खबर में बता दिया की श्रीमती इन्द्रा जी नहीं रही ! अचानक एक मुर्दनी सी छा गयी ! फिर गुंडे और लफंगों कि बन आई, निर्दोष और असमर्थ लोगों को बेरहमी से मारा जाने लगा ! वे सिख जो मजदूरी करके अपने परिवार को पालते थे, जो छोटे मोटे दुकानदार थे या ट्रक ड्रावर थे पकड़ पकड़ के जिन्दे जलाए जाने लगे ! जो हिन्दू सस्थाएं इनको बचाने आगे आरही थी, इन मुवाली गुंडों ने उन्हें भी नहीं छोड़ा ! एक बार तो दिल्ली की सडकों पर मृत्यु का तांडव नृत्य होने लगा था ! आनन् फानन में राजीव गांधी को प्रधान मंत्री बनाया गया और एक आदेश के तहत इस हत्याकांड को बंद कराया गया ! सारा देश शोक में डूब गया ! विपक्ष भी इस दर्दनाक घटना से अचम्भित था ! इन्द्रा जी को राष्ट्र की तरफ से श्रद्धांजली दी गयी ! देश विदेश के राष्ट्राध्यक्षों ने इस कायराना हरकत के लिए, अफसोश जताया और दिवगंत आत्मा को श्रद्धांजलि अर्पित की ! कुछ गुंडों को पुलिस ने जेल में बंद कर दिया लेकिन इनके रिंग लीडरों को पकड़ने में असमर्थ रही क्यों कि वे बेदी नाक वाले बड़ी शाख वाले पार्टी के नेता थे ! भारत के प्रथम प्रधान मंत्री की सुपुत्री, देश की तीसरी प्रधान मंत्री, भारतीय नारी समाज की एक उभरती हुई प्रतिभा, नेहरू गांधी खानदान का जलता हुआ चिराग अचानक अंतरिक्ष में विलीन हो गया ! ऐसे लगा जैसे एक आंधी आई, बहुत कुछ उड़ाकर ले गयी और उसके बाद का सन्नाटा ! ३१ दिसम्बर १९८४ को कोटद्वार पौड़ी गढ़वाल में मेरे बड़े मामा जी श्री प्रतापसिंह नेगी, निवर्तमान सांसद ८८ साल की उम्र में स्वर्वासी हुए ! यह खबर मुझे दिल्ली आने पर मालूम हुई !
यूनिट हाई अल्टी ट्यूड एरिया में यूनिट का जम जमाव हो चुका था ! सारी पहाड़ियां यहाँ तक यूनिट का बेस भी बर्फ से ढक चुका था ! ठंडी कंपकंपाने वाली सीट लहरें चलने लगी थी ! सारे चश्मे, नदियाँ जम गयी थी ! इलाका शांत, सडकों पर बाजारों में भीड़ कम हो गयी थी ! सेना के जवानों को तो अपना काम करना ही है चाहे, बर्फ पड़ रही है, या आंधी तूफ़ान चल रहा है ! उसे इलाके की रेकी करने को भी जाना है, उसे लाईन आफ कंट्रोल पर रात दिन चौकना हो कर ड्यूटी देनी होती है ! मैं यूनिट पंडित जोशी जी के साथ इन बर्फीली पहाड़ियों पर चढ़ता था और कुदरत की इस अद्भूत लीला का आनंद लेता था पंडित जी के साथ ! सेना की सेवा करते करते २७ साल हो गए थे और रिकार्ड्स से पेन्शन जाने की सूचना आगई थी ! मुझे ५० साल से पहले ही सेना से अवकास पर चले जाना था, बच्चे अभी पढ़ने वाले थे, सिविल में जम जमाव करने के लिए रिसेटलमेंट कोर्स करना जरूरी था ! दो महीने के कोर्स के लिए मैं दिल्ली आगया ! फरवरी १९८५ ई० में वापिस यूनिट जाना था, मोटर मार्ग उधमपुर से आगे बंद था इसलिए दिल्ली से चंडीगढ़ गया वहां से बाई एयर लेह उतरा और वहां से रंग बिरंगे पर्वत श्रेणियों, जलेबी नामक रोड से होते हुए मैं कारगिल यूनिट में पहुंचा ! मई के पहले सप्ताह में मैं छुट्टी लेकर फैजाबाद आया, बच्चों को दिल्ली शिफ्ट किया ! १५ मई को अपने भतीजा मुनेंद्र्सिंह की शादी कल्पना से की और वापिस कारगिल यूनिट में चला गया ! आज मुनेद्र के दो लडके हैं , अंकित और अंकुश !
१५ अगस्त को महामहिम राष्ट्रपति ने मुझे आनरेरी लेफ्टीनेंट रैंक से नवाजा और २६ जनवरी १९८६ को आनरेरी कैप्टेन बना ! कारगिल की पहाड़ियों को छोड़ कर श्रीनगर काश्मीर की सुन्दरता का भरपूर आनंद लेकर जम्मू आगया ! काश्मीर श्रीनगर में झीलें, निशात गार्डन, चिनार और देवदार के वृक्ष पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं ! मुग़ल बादशाह औरंगजेब ने इसी काश्मीर को कहा था कि "जमीन पे अगर कहीं जन्नत है तो यहीं है यहीं है" !
जम्मू के पास ही मेरी पुरानी यूनिट थ्री राज रिफ थी, इसलिए यूनिट में जाकर पुराने संगी साथियों के साथ दो दिन पुरानी यादों को ताजी करके दिल्ली चला गया और पहली नवम्बर १९८५ ई० को फ़ौज को आखरी सलूट करके पेंशन लेकर एक सिविलियन नागरिक बन गया !

Saturday, August 7, 2010

मेरी कहानी (सत्रहवां भाग )

ये ब्ल्यू स्टार बड़ी दुखद घटना थी ! यहाँ हम अपने लोगों से लड़ रहे थे ! अगर सैनिक मर रहे थे वे भी हिन्दुस्तानी सेना के और स्वर्ण मंदिर के अन्दर बैठे आतंकवादी मर रहे थे वे भी हिन्दुस्तानी ! बड़े दुखी मन से हमें आतंकियों को पकड़ कर पुलिस के हवाले करना पड़ता था ! खैर , जून तक हमारी यूनिट चंडीगढ़ से फैजाबाद वापिस आ गयी थी ! १९८३ का साल भारतीय क्रिकेट के लिए एक यादगार साल है इसी साल भारतीय क्रिकेट टीम ने कपिलदेव की कप्तानी में विश्व वर्ड कप जीता था ! फैज़ाबाद की कुछ मधुर स्मृतियाँ अभी भी दिल के एक कोने में अंगडाइयां लेने लगती है, जैसे वहां के बन्दर ! अयोध्या जी भगवान राम की जन्म भूमि, जहां 'राम' वहीं हनुमान जी, जहां हनुमान जी वहां उनकी सेना भी होगी ! कहीं कहीं तो ये कलजुगी बन्दर भारी मुसीबत खडी कर देते हैं ! एक दिन हमारी यूनिट का एक सूबेदार जगमालसिंह रेलवे स्टेशन पर जवानों से मालगाड़ी के डिब्बों से ऑर्डिनेंस डिपो से आया हुआ सामान उतरवा रहा था, की अचानक एक बन्दर पेड़ से छलांग मार कर सूबेदार साहेब के कंधे में बैठ गया, दोनों हाथों से उनका चेहरा अपनी और घुमाया और गाल बुरी तरह से काट दिया ! यह सब कुछ इतना जल्दी हो गया की स्टेशन पर खड़े लोग भी नहीं समझ पाए की यह अचानक क्या हो गया ! बन्दर का भी जहर प्राण घातक होता है, सूबेदार जी को अस्पाल ले गए, इंजेक्शन लगे तब कहीं उन्हें चैन आया ! फैजाबाद में मेरे क्वाटर के पीछे कुछ बागवानी करने के लिए जमीन पडी थी, मैंने उसमें मकई बो दी ! जमीन उपजाऊ थी, मकई जल्दी निकल आई !
बरसात का मौसम, मकई में दाना निकल आया था और हम किसी खास अवसर का इंतज़ार कर रहे थे, जब हम अपनी खेती की मकई के रूप में पहली फसल घर में लाते ! और एक दिन सुबह सबेरे, रिम झिम रिम झिम वारीष पड़ रही थी उधर बगीचे में एक भारी भरकम बन्दर आराम से बैठ कर मकई तोड़ तोड़ कर स्वाद ले ले कर खा रहा था ! मैंने खिड़की से झाँक कर देखा, मेरे होश उड़ गए, इतना भारी बन्दर ! हिम्मत बांधी, एक डंडा हाथ में लिया, बन्दर के ठीक पीछे जाकर जोर का डंडा उसकी पीठ पर दे मारा ! सही में वह मकई खाने में इतना तल्लीन था की उसने मेरे कदमों की आहट नहीं सुनी ! अचानक के इस हमले से वह सक पका गया और वहीं से एक ऊंची छलांग मार कर एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर कूदता फांदता नज़रों से ओझल हो गया और दुबारा नहीं आया ! यहाँ यूनिट का तीन साल पीस टाईम पूरा होने जा रहा था, यूनिट को कारगिल जाने का आदेश हो गया !
उर्वशी ने १० वीं पास कर लिया था और ११ वीं क्लास फैजाबाद में खुला नहीं था, मुझे उर्वशी को दिल्ली कंटोन्मेंट केन्द्रीय विद्यालय में भरती कराना पड़ा ! यहाँ मेरी लड़की दो साल परिवार से दूर विद्यालय होस्टल में रही !
कारगिल की ओर
सितंबर १९८४ ई० को यूनिट कारगिल के लिए रवाना हो गयी ! बच्चों को फैजाबाद में ही छोड़ आया था ! कश्मीर जाने का यह तीसरा चांस था लेकिन श्रीनगर पहली बार जा रहा था ! जम्मू तक रेल का सफ़र था, फिर जम्मू से आगे के लिए फ़ौजी कान्वाई तैयार खडी थी ! एक दिन सामान को रेल से ट्रकों में बदली करने में लगा और अगले दिन उधमपुर होते हुए श्री नगर के लिए यूनिट जम्मू से रवाना हुयी ! फूलों की घाटी, जंगल, उठते हुए पहाड़, पहाड़ों के ऊपर बीछी हुई बर्फ की सफ़ेद चद्दर, चिन्नार, चीड, देवदार के आसमान को छूते हुए पेड़, जवाहर सुरंग पार करते यूनिट श्रीनगर पहुँची ! एक दिन श्रीनगर में रुकने के बाद दराज, एशिया का सबसे ठंडा स्थान पहुंचे ! यहाँ पर दो नदियाँ मिलती हैं और हवा की ठंडी लहरे चलती हैं ! एक रात दराज में रहे और अगले दिन कारगिल यूनिट को अलॉट किये हुए जगह पर पहुंचे ! जगह को बटालियन की अग्रिम पार्टी ने जाने वाली यूनिट से पहले ही ले लिया था ! हमारी यूनिट का बेस कारगिल नदी के किनारे एक समतल स्थान पर था, इसके ऊपर एक नहर है जो कारगिल नदी से ही निकाली गयी है ! बनस्पती से रहीत बिलकुल रुखा, हवा का दबाव बहुत कम ! शुरू शुरू में १५ बीस दिन तक तो शांस लेने में परेशानी होती है ! फिर नार्मल ! कम्पनियों को सामने की ऊंची ऊंची बर्फ से ढकी पहाड़ियों में मोर्चे बनाकर रहना पड़ता है ! जहां पर बेस है यहाँ भी नवम्बर से और मई तक बर्फ रहेगी ! पानी के चश्मे सब जम जाते हैं ! नदी नाले भी बर्फ से जम जाते हैं ! यहाँ के स्थानीय लोग नहाते बहुत कम हैं, सर्दियों के लिए, इधन और खाने की सामग्री को जमा करके रखना पड़ता है ! मई के आखीर में बर्फ पिघलने के बाद ये स्थानीय लोग खेतों में गेहूं बो देते है जो अगस्त सितम्बर तक कटने के लिए तैयार हो जाती है ! बर्फ पड़ने से पहले तक ये खेतों में कुछ सब्जियां भी उगा लेते हैं ! ठण्ड बहुत होने से बच्चे कम हैं ! जवानों को हर ६ महीने के बाद छुट्टी भेजा जाता है ताकी उन्हें ठंडी से होने वाली बीमारियों से बचाया जा सके ! यहाँ के कुत्ते बड़े भेडिये की तरह भयानक लगते हैं ! चूहे भी मोटे तकड़े खुले आम कीचनों और गोदामों में घुमते फिरते रहते हैं ! बिल्ली बहुत कम हैं ! शुरू शुरू में तो ब्रेक फास्ट की पुरियां ये हमारे हाथ से छीन कर ले गए थे ! बारिकें बासा सब लकड़ी के बने हैं ! यूनिट बेस के साथ ही हेलीपैड ग्राउंड है ! सामने कारगिल का मार्केट पड़ता है ! मई-जून के महीने में बर्फ पिघलनी शुरू हो जाती है नदी नालों में बाढ़ आजाती है ! यहाँ से लेह के लिए सीधे रोड है ! लेह लदाख करीब ३००-३५० किलोमीटर पड़ता है कारगिल से !

Friday, August 6, 2010

रूस्तम और सोहराव

रूस्तम और सोहराब का किस्सा कभी बचपन में स्कूली किताबों में पढ़ा था, लेकिन इसकी और गहराई में जाना चाहता था की आखिर वो कौन सी मजबूरी थी की एक बुजुर्ग को एक जवानी की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए सुकुमार पर बेरहमी पर धोखे से कटार का वार करना पडा और उसके बार बार पूछने के बावजूद कि "आप रूस्तम तो
नहीं हैं " ? लेकिन रूस्तम ने सोहराब के प्रशन्न को ही सोहराब की चाल समझी और बिलकुल इनकार कर दिया की वह रूस्तम है ! वैसे भी उस जमाने में रूस्तम पहलवानों का सिरमौर था ! उसके साथ आमने सामने दो दो हाथ करने की कल्पना से ही बड़े बड़े पहलवानों के पसीने निकल आते थे ! फिर सोहराब अभी १६-१७ साल का किशोर, जिस्मानी ताकत में फूर्ती, चौकनापन, पहलवानी के दाव, रूस्तम पर भारी पड़ रहे थे, रूस्तम को लगा की अगर मैं असली रूस्तम इस बालक से हार गया तो, रूस्तम का नाम तो बच जाएगा इस हारने की जिल्लत से, इसलिए उसने रूस्तम होने से इनकार कर दिया ! उधर सोहराब को उस रूस्तम में पता नहीं क्यों ऐसा लग रहा था कि वह ही उसका पिता रुस्तम है, उसकी पकड़ रूस्तम पर ढीली पड़ती जा रही थी ! उसकी माँ ने कहा था, बेटा अपना भेद की "तू सोहाराब 'रूस्तम' का बेटा है", किसी पर मत खोलना ! इसलिए अपना भेद खोलने से पहले वह यकीन करना चाहता था की 'यह शख्स जिससे मैं इस अखाड़े में लड़ रहा हूँ मेरा अपना पिता है, लेकिन उसका बाप उसकी तड़प को नहीं भांप पाया और अपनी सौहरत, अपने टाईटल को बचाने के लिए उसने उसकी सुस्ती का फायदा उठाया और सोहाराब को धोके से कटार घोंप दी ! मरते मरते बेटे ने बाप को कहा, "तुमने मुझे धोके से मारा है, जब मेरा पिता रूस्तम सुनेगा की तुमने मुझे धोखे से मारा है तो तुम्हे ज़िंदा नहीं छोड़ेगा ! रुस्तम ने जब उसके बाजू में बंधी निशानी देखी जो उसने उसकी माँ को दी थी, तो उसके होश उड़ गए, लेकिन अबतो पक्षी पिंजरा छोड़ कर ऊंचे नील गगन में जाकर नज़रों से ओझल हो चुका था ! कितना ददर्नाक घटना थी ये न केवल माँ-बाप के लिए बल्की पढ़ने वालों के लिए भी !

Wednesday, August 4, 2010

मेरी कहानी (सोलहवां भाग)

बने बनाए मकान में रहने चले जाना रहने के लिए ! बसी बसाई बस्ती में जाकर बस जाना, वहीं के लोगों के रंग में रंग जाना, आसान होता है, इसके की एक नया मकान बनाना या नयी बस्ती बसाकर नए लोगों को आमंत्रित करना उस बस्ती में बसने के लिए ! इसमें शरीर और दिमाग दोनों को कठिन परिश्रम करना पड़ता है ! ठीक ऐसे ही किसी पुरानी बटालियन में पोस्ट हो कर चले जाना या किसी नयी बटालियन को रेज करने में है ! रेजिमेंट की तमाम दूसरी यूनिटों से जे.सी ओज और जवानों को बुलाकर उनकी जस्मानी और दिमागी दोनों का टेस्ट लेना, मेहनती, वफादार, बहादूर और खिलाड़ी सैनिकों का चुनाव करना ! सेना मुख्यालयों का चक्कर लगा लगाकर नयी यूनिट के लिए फंड मंजूर करवाना, आर्मी एक्ट, रूल्स, आर्मी रेगुलेशन आदि को इकठ्ठा करना ! जीप-जोंगा, छोटी बड़ी गाड़ियों-ट्रकों की डिमांड करना, आर्डनेंस स्टोर्स मंगाना ! बहुत मसकत करनी पड़ती है नयी बटालियन को रेज करने में !
२० वीं बटालियन दी राजपुताना राईफल्स पहली जनवरी सन १९८१ ई० को राज रिफ सेंटर में ले.जनरल ए एम सेठना (कर्नल आफ दी रेजिमेंट) के कर कमलों द्वारा, पंडित जी के मन्त्रों के साथ एक नया झंडा लहरा कर खडी की गयी ! साथ में सेंटर कमांडेंट ब्रिगेडियर धवन तथा स्टाफ भी मौजूद था ! यहीं पर मेजर सतबीर सिंह (१७ आर आर ) को ले.कर्नल बनाकर नयी बटालियन के कमांडिंग आफिसर बनाया गया ! यहीं सेंटर में एक बारीक मिल गयी थी यहीं नयी यूनिट का कार्यालय खोला गया ! कुछ दिनों बाद यूनिट को परेड ग्राउण्ड में भेजा गया ! 12 जनवरी को मैंने यूनिट ज्वाइन की ! अब तो काम ही काम था, दिन भर सेना मुख्यालय, एरिया मुख्यालय, सिस्टर बटालियनों के चक्कर लगाना, उनसे आफिस के लिए स्टेशनरी रूल्स रेगुलेशन जरूरी आर्मी ऑडर्स, तथा अन्य सामग्री ले के आना और रात को आफिस का काम करना ! कभी कभी तो पता भी नहीं लगता था की रात कब आई और कब दिन निकल आया ! कुछ दिनों के बाद सूबेदार मेजर बासुसेव भी यूनिट में आगये ! उस समय जे सी ओज थे जीले सिंह, शीशराम, इश्वर सिंह, रामसिंह, आदि आफिसरों में मेजर यू आर चौधरी, मेजर आर डी कारले, मेजर जे एस चौहान, मेजर कौशिक, मेजर विनोदकुमार , मेजर सहगल, कैप्टेन दलाल, चावला, ए के माथुर, राना ले.चौधुरी,
ले.आर पी जोशी भी यूनिट में आ चुके थे ! ६ महीने का समय लगा यूनिट को पूरी तरह से आत्म निर्भर होने में ! सारे आफिसर्स, जे सी ओज और जवानों की रात दिन की कठीन मेहनत रंग लाई और यूनिट २० वीं बटालियन दी राजपूताना राईफल्स, 'राजपूताना राईफल्स'
की एक नयी बटालियन के रूप में पूरी तरह ३० जून १९८१ तक तैयार हो गयी ! ४ जौलाय १९८१ को यूनिट को फैजाबाद भेजा गया ! फैजाबाबाद एक जिला है उत्तर प्रदेश का ! यहाँ पर डोगरा रेजिमेंट का सेंटर है !
अयोध्या नगरी इसी फैजाबाद में पड़ती है, जहां त्रेता युग में भगवान् रामचन्द्र जी राज करते थे ! इसके साथ ही घाघरा नदी बहती है, जिसे "सरयू" के नाम से भी जाना जाता है ! काफी बड़ा कंटोमेंट एरिया है जहां १९७१ की लड़ाई के कैदियों को बैरिक बना बना कर रखा गया था ! अमरूदों और जामुनों के बहुत सारे बगीचे हैं ! इमली के बहुत सारे पेड़ हैं ! घाघरा नदी के ऊपर एक बहुत बड़ा पुल है जिसका नाम "इन्द्रा गांधी पुल" रखा गया है ! थोड़ा उतर में गुप्तार घाट है ! एक मंदिर है जहाँ भगवान रामचंद्र जी के चरण अंकित है ! कहते हैं भगवान राम अंतिम बार इसी घाट पर आये थे और यहीं पर उन्होंने जल समाधी ले ली थी ! श्रद्धालु जो अयोध्या जी के दर्शन करने आते हैं, वे इस घाट पर जरूर आते हैं, गौदान करते हैं ! इस नदी के किनारे कही आश्रम हैं जहां लम्बी लम्बी उम्र के सन्यासी रहते हैं ! बड़े बड़े वट वृक्ष हैं, जहां बहुत प्रकार के पक्षी आकर विश्राम करते हैं ! इन वृक्षों के चारों ओर पक्का चबूतरा बना हुआ है ! वरगद की जड़ें नदी में उतर जाती हैं ! इन्हीं जटाओं के सहारे स्थानीय बच्चे नदी में दुबकी लगाते हैं और तैरने का पूरा आनंद लेते हैं ! यहाँ से १५-१६ मील पर अयोध्या नगरी पड़ती है ! कनक मंदिर, बाल्मीकि मंदिर, हनुमान मंदिर काफी आकर्षक हैं ! हम लोग फैजाबाद में १९८१-१९८४ तक रहे हैं और अयोध्या में रामजन्म भूमि देखने का कही बार अवसर मिला ! कोई टेंशन नहीं थी ! उन दिनों राम मंदिर और बाबरी मस्जिद का कोई झगड़ा नहीं था ! राजनीति के दलालों ने मंदिर-मस्जिद की चिंगारी भड़काई और आज आलम यह है की यहाँ पर न मंदिर है न मस्जिद है ! रामजन्म भूमि एक खँडहर बन कर रह गयी है !
उन दिनों यहाँ फैजाबाद में केन्द्रीय विद्यालय नहीं था, इसलिए बच्चों को संन १९८२ ई० में जब यहाँ केन्द्रीय विद्यालय खुला, लाया ! मेरी बेटी उर्वशी दसवीं में पढ़ती थी, राजेश आठवीं में और ब्रिजेश चौथी में पढ़ता था ! संन १९८३ ई० को केन्द्रीय विद्यालय फैजाबाद का १० वीं परिक्षा के लिए सेंटर लखनऊ पडा ! मार्च १९८३ ई० को उर्वशी के साथ
लखनऊ गया और १५ दिन वहीं रहा ! इन ही दिनों सी ओ सतबीर सिंह जी की पोस्टिंग आ गयी और यूनिट के नए सी ओ बने ले.कर्नल बी एस रजावत ! यूनिट जवानों को शारीरिक और मानसिक चुस्त दुरुस्त रखने के लिए हर साल जनवरी के महीने में एक महीने के लिए मध्य प्रदेश के सुहाग पहाड़ियों के पठारी भागों में, रीवा के पास ट्रेनिंग कैम्पों में रहना पड़ता था ! रिवर क्रास्सिंग, एडवांस, अटैक, असाल्ट ट्रेनिंग और सालाना फील्ड फायरिंग आदि का अभ्यास किया जाता था ! बिना किसी पूर्व सूचना के अचानक यूनिट को लड़ाई के लिए तैयार होने का बिगुल बज जाता था (मोबाईल स्कीम )! फिर प्रदेश की सिविल प्रशासन को ऐसे मौकों पर मदद देना जब विद्रोह, अराजकता, असामाजिक तत्वों को कंट्रोल करने में पुलिस असमर्थ जो जाती है ! फिर सबसे ज्यादा प्रेशर पड़ता यूनिट के ऑफिसर्स, जे सी ओज और जवानों पर जब यूनिट की सालाना इंस्पेक्शन जो ब्रिगेड कमांडर द्वारा की जाती है, की तैय्यारी करनी पड़ती है ! यहाँ पर हर एक की , सी ओ से जवान तक, शारीरिक और मानसिक फ़िटनेस सफाई, डाकूमेंट्स, लड़ाई का पूरा सामान और कम से कम समय में यूनिट को लड़ाई के लिए तैयार करना, की प्रैक्टिस ! कमांडर द्वारा दी गयी रिपोर्ट "की यूनिट लड़ाई के लिए फिट है या नहीं", पर ही यूनिट का भविष्य निर्भर करता है ! ख़ास तौर पर जब यूनिट नयी हो ! यहाँ हमने यूनिट की तीन सालाना इंस्पेक्शन करवाई और तीनों ही अब्बल दर्जे की रही ! नाम तो पीस होता है लेकिन जवान के बिस्तर के नीचे हमेशा रस्सी तैयार मिलती पीस टाईम में ! सन १९८४ ई० पंजाब में भिंडरावाल ने खालिस्तान के नाम पर अमृतसर के स्वर्ण पर कब्जा कर दिया ! मंदिर को खाली करने के लिए सेना की मदद ली गयी ! काफी खून खराबा हुआ तब जाकर मंदिर को खालिस्थान के आतंक वादियों से मुक्त किया गया ! हमारी यूनिट उस समय चंडीगढ़ "ऐड टू सिविल पावर " ड्यूटी पर थी ! इस आपरेशन का नाम था "ब्यू स्टार" !

Tuesday, August 3, 2010

मेरी कहानी (पन्द्रहवां भाग)

केंद्र में जनता पार्टी का राज आ गया ! जनता का भरोषा, जनता पार्टी की सरकार से बड़ी बड़ी अपेक्षाएं ! अटल बाजपेई विदेश मंत्री बने और अडवानी जी को सूचना प्रसार मंत्रालय सौंपा गया ! राज नारायण जिसने श्रीमती इन्द्रा गांधी जी को हराया था स्वास्थ्य मंत्री बनाए गए ! वे अपने मंत्रालय साईकिल से जाते थे ! लेकिन चरणसिंह जी को तो जल्दी से जल्दी प्रधान मंत्री की कुर्सी चाहिए थी ! वे मोरारजी के मातहत गृह मंत्री तो बन गए लेकिन उनको यह मंत्रालय राश नहीं आया ! उन्होंने अपनी पार्टी क्रांति दल को जनता पार्टी से अलग कर दिया ! उधर जन संघ भी भारतीय जनता पार्टी के नाम से अलग हो गयी ! इन्द्रा गांधी को चरणसिंह ने एक दिन के लिए जेल में बंद किया था, इन्द्रा जी को इस अपमान का बदला लेना था ! उन्होंने चरणसिंह को आश्वासन दिया की अगर वे मोरार देसाई की सरकार से अलग हट जाते हैं तो इन्द्रा कांग्रेस उन्हें नयी सरकार बनाने में मदद करेगी ! मोरार जी देसाई की सरकार अल्प मत में आ गयी, राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने चरणसिंह को सरकार बनाने का न्योता दिया और एक हफ्ते के अन्दर संसद में अपना बहुमत सिद्ध करने का आदेश दिया ! इन्द्रा जी ने चरणसिंह सरकार को सपोर्ट देने से इनकार कर दिया ! चरणसिंह ने एक दिन भी प्रधान मंत्री की हैसियत से संसद में कदम नहीं रखा था ! संसद में बहुमत न जुटा पाने के कारण श्री चरणसिंह जी ने राष्ट्रपति को संसद भंग करने की सलाह दे दी और संसद भंग कर दी गयी !
राष्ट्रपति ने चरणसिंह जी को नयी सरकार के गठन तक कार्य वाहक प्रधान मंत्री की हैसियत से सरकार चलाने का आदेश दिया ! इधर १९८० तक कांग्रेस में संजय गांधी, इन्द्रागांधी का दूसरा लड़का काफी उंचाइयां नाप चुका था ! उसने दिल्ली को नया रूप देने का स्वप्न पाल रखा था ! विपक्ष भी मानने लगे थे की संजय गांधी काँग्रेस का एक चमकता हुआ हीरा है ! उसने सबसे पहले सरकार का ध्यान बिगड़ते हुए प्रयावरण, पेड़ पौधे लगाना, फॅमिली प्लानिंग और प्रशासन को चुस्त दुरुस्त करने के लिए अनुशासन की ओर दिलाया ! अभी तक किसी नेता का ध्यान इन मुद्दों की तरफ नहीं गया था ! सन १९८० में संसद का चुनाव हुआ और संजय गांघी का करिश्मा कांग्रेस को भारी मतों से जीता गया ! कांग्रेस ३ साल के अंतराल के बाद फिर सता पर काविज हो गयी ! जनता, जनता पार्टी के सता लोलुप नेताओं से तंग आ गयी थी ! कइयों की तो जमानतें भी जब्त हो गयी थी ! लेकिन अचानक बिजली चमकी और एक चमकता सितारा संजय गांधी एक एयर क्रेश में २३ जून १९८० को मारे गए ! सितारा जमीन का फिर सितारों से जा मिला दूर नील गगन में जाकर !
इधर मैं बच्चों को दिल्ली से बीकानेर ले आया ! बच्चों को केन्द्रीय विद्यालय में दाखिला मिल गया ! मुझे यूनिट में ९ साल हो चुके थे, पोस्टिंग फिर रिकार्ड्स दिल्ली में हो गयी ! यूनिट के कमान अधिकारी पालीवाल साहेब भी पोस्टिंग चले गए थे और ले.कर्नल पुनिया कमांडिंग आफिसर बन कर यूनिट में आ गए ! पहली जनवरी सन १९७९ ई० को मैं दिल्ली आगया ! उन दिनों सेंटर कमांडेंट कर्नल हरभजन सिंह थे ! वरिष्ट रिकार्ड्स अधिकारी
मेजर मोती सिंह भी उन्हीं दिनों पोस्ट होकर आए थे ! इससे पहले भी हम दोनों साथ रह चुके थे ! जून १९८० में मैं सूबेदार बन गया था ! बच्चे भी दिल्ली शिफ्ट हो गए थे ! दिल्ली में इस समय तक काफी बदलाव आ चुका था ! सारे बच्चों को केन्द्रीय विद्यालय में दाखिला मिल गया था !
सन १९७९ ई० में मैंने अपनी भतीजी सुशीला की शादी शर निवासी श्रीपाल सिंह नेगी से कर दी !
इन दिनों मेरी तबियत कुछ खराब रहने लगी थी, कब्जियत, सर दर्द तथा शरीर थका थका सा रहने लगा था ! मैंने कभी योगा के बारे में पढ़ा था ! लगन लग गयी योगा सिखने की ! एक दिन तलाश करते करते मैं गोल डाकखाने के पास अशोक रोड नंबर वन पर पहुँच गया ! वहां बोर्ड लगा हुआ था " विश्वायातन योगाश्रम " ! मुझे लगा मेरी मंजिल मिल गयी ! मैं अपने एक दोस्त राजकुमार के साथ गेट के अन्दर स्वागत कक्ष में चला गया ! वहां एक लड़की रिसेप्शन पर बैठी थी ! हमने उस से कहा की हम योगा सिखाना चाहते हैं ! उसने मुझे एक छोटी सी पुस्तिका दी जिसमें योग के बारे में हल्की सी जानकारी दी गयी थी ! इस पुस्तिका की कीमत थी मात्र .७५ पैसे, साथ ही इस पुस्तक के जरिए मुझे इस योग संस्था की सदस्यता भी मिल गयी थी ! जब मैं बड़े हाल में गया वहां इस योग संस्थान के योग गुरु " धीरेन्द्र ब्रह्मचारी जी " विराजमान थे ! चारों तरफ शिक्षक शिक्षककाएं बैठी थी और बीच में बैठे थे योग गुरु श्री धीरेन्द्र ब्रह्मचारी जी, तेजस्वी चेहरा दमकता हुआ, बिलकुल काले केश जैसे सितारों के मध्य चाँद ! मुझे लगा की मैं सही जगह पर पहुँच गया हूँ ! वहां हर रोज दिन में दो बार योगा की क्लास चलती थी, सुबह ६ बजे से ८ तक और शाम को ३ से ५ बजे तक ! सुबह आना तो मुमकिन नहीं था लेकिन मैंने शाम की क्लास ३ से ५ वाली ज्वाइन करली ! रविवार को मैं सुबह ही क्लास में चला जाता था ! वहा, जल नीति, प्रशालन विधि, आँख कान और गले की सफाई की तकनीक सीखी ! जैसे जैसे दिन निकलते गए शरीर के अन्दर एक नयापन सा महसूस होने लगा ! ४५ दिन कभी सुबह कभी शाम, इस योग संस्थान से योगिक क्रियाएं प्राणायाम की शिक्षा ग्रहण करके काफी हद तक अपने को रोगमुक्त करने में मैं कामयाब हुआ ! इन दिनों भारतीय सेना के स्थल सेनाध्यक्ष थे जनरल ओ पी मलहोत्रा ! हर रेजिमेंट की एक एक बटालियनें और बधाई जा रही थी, राजपूताना राईफल्स की भी २० वीं बटालियन खड़ी की गयी १ जनवरी १९८१ को ! मुझे इस नयी बटालियन में पोस्ट कर दिया गया !

Monday, August 2, 2010

अमेरिका में हनुमान मंदिर

अमेरिका में रहने वाले हिन्दुस्तानी अपनी परम्परा, संस्कृति और सभ्यता को जीवित रखे हुए हैं ! यहाँ हर प्रदेश में जहां जहाँ भी हिन्दुस्तानी हिन्दू अच्छी संख्या में हैं, मंदिर बनाते हैं ! ये यहाँ पर उंच नीच, छोटा बड़ा के झमेंलों में न पड़ते हुए संगठित होते हैं ! मंदिर समिति बनाते हैं ! अपनी आर्थिक स्थिति के मुताबिक़ मंदिर के नाम पर चंदा इकट्ठा किया जाता है ! यहाँ सभी वर्ग के लोग हैं, कोई डाक्टर इंजिनियर है तो कोई वकील है, तो कोई बड़ा व्यापारी है, कहने का मतलब जो भी यहाँ अमेरिका में आया है वह अपनी योग्यता की डिग्री लेकर ही आया है, इस तरह मंदिर के नाम पर चंदे की रकम इतनी हो जाती है की यहाँ मंदिर समिति जमीन लेकर आराम से मंदिर बना देती है ! दो तीन मंदिरों में जाने का मौका मुझे यहीं न्यू यार्क में मिला ! गणेश मंदिर, यह मंदिर साउथ इंडियनों के प्रयाशों का फल है ! काफी बड़ा मंदिर है, सभी देवी देवताओं की मूर्तियाँ इस मंदिर में हैं ! बाहर कार पार्किंग के लिए काफी जगह है ! कुछ लोग तो यहाँ आकर, रामायण और सत्य नारायण की कथा भी करवाते हैं ! एक मंदिर है "हनुमान मंदिर", यह मंदिर भी करीब ३०-३५ साल पुराना है ! कहते हैं यहाँ (हेमप् स्टेड सिटी में ) पहले स्कूल था, गुरुमां जो राजस्थान की रहने वाली हैं, ने यहाँ आकर यहाँ बसे हिन्दुस्तानी हिन्दुओं की सहायता से मंदिर कमेटी बनाई और इस स्कूल को खरीद लिया ! फिर स्कूल की जगह मंदिर ने ले ली ! काफी बड़ा मंदिर है, एक बड़ा हौल है जिसने हनुमान जी की एक बड़ी और एक मीडियम साईज की संगमरमर की मूर्ती है ! दूसरे हौल में गणेश जी, शिव पार्वती जी, दुर्गी माँ, काली की प्रतिमाएं हैं, इसी हौल में कृतिरिम पहाडी बनी है उस पहाडी के ऊपर शिव जी की प्रतिमा है और उनके सर से पानी की धारा ऊपर उठती हुई नीचे गिरती है ! फिर शिव लिंग स्थापित है, साथ में नंदी और छोटी छोटी मूर्तियाँ गणेश, कार्तिकेय और माँ पार्वती हैं ! इसी हौल में दक्षिण भाग में नौ गृह : बृहस्पति , बुध, शुक्र, शनि, मंगल, चन्द्र, राहू, केतु और उनके बीच में घूमते हुए सूर्य रथ के ऊपर विराजमान हैं ! बाहर कार पार्किंग है जिसमें मदिर में आने वाले दर्शनार्थी अपनी कार मंदिर परिसर में ही खडी कर सकें ! वैसे मंदिर रोड के किनारे ही है, लेकिन व्यवस्था इतनी अच्छी है की मंदिर में आने के बाद बच्चे सुरक्षित रहते हैं और ममी पापा आराम से पूजा अर्चना करते हैं बिना बच्चों की चिता किये ! हर शनिवार को कोई न कोई भक्त सारे मंदिर में आने वालों को खाना देता है ! राम नवमीं शिव रात्री, कृष्ण जन्माष्टमी, होली, दिवाली और दशहरा मंदिर में बड़े धूम धाम से मनाया जाता है ! नीचे बेसमेंट है जिसमें एक सभागार बनाया गया है, जिसमें मीटिंगे होती हैं, कभी कभी भारत से बड़े संगीतकार, प्रसिद्द तबला वादक, शहनाई के जादूगर इसी सभागार में आकर प्रोग्राम देते हैं और अमेरिकन भारतियों को कुछ देर ही सही हिन्दुस्तान की धरती के दर्शन करा देते हैं ! एक सजन जिन्हें यहाँ ३० साल हो चुके हैं, अच्छा बिजनिस है, बच्चे सारे सर्विस कर रहे हैं, "कहने लगे यहाँ आने वाला हर भक्त मंदिर सेवा के लिए तैयार रहता है और मंदिर लोगों को मिलाने का एक ज़रीया भी है" ! जब मैंने उन्हें पूछा की क्या वे यहाँ खुश हैं ? बड़े मायूस होकर कहने लगे, "रावत जी, क्या बताऊँ, की मैं यहाँ कितना खुश हूँ, वहां भारत में माँ अकेली है, यहाँ सास बहु की बिलकुल नहीं बनती, वे इस समय ८१ साल की हो चुकी हैं, उनकी सेवा करना चाहता हूँ, कर नहीं सकता ! बच्चे न गुजराती बोलते हैं न हिन्दी बोलते हैं, आगे की पीढी ने तो अपनी परम्पराएं और सभ्यता ही भूला दी है ! अब पछता रहा हूँ, क्यों आया मैं यहाँ, यहाँ पैसा है, रुतवा है, मकान है लेकिन मन की शांती नहीं है ! जो अपनी जन्म भूमि में है वह सब यहाँ नहीं है ! लोग जब तक सर्विस करते हैं उन्हें सोचने का अवसर नहीं मिलता, लोग सोचते हैं वे खुश हैं, लेकिन रिटायर होने के बाद, अकेलापन, फिर अपना देश याद आता है"! कल वहां रामायण का पाठ था, दो सज्जनों ने अपने बच्चों का जन्म दिन मंदिर में मनाया, हम भी (मैं और मेरी पत्नी) इसमें सामिल हुए, पूजा अर्चना हुई विधि विधान से, हनुमान जी की आरती हुई, प्रसाद वितरण हुआ, हमने प्रसाद लिया, खाना खाया और रात के ११ बजे के करीब अपने निवास स्थान पर पहुंचे ! यहाँ म्येलविल में एक परिवार जिला प्रतापगढ़ यूं पी का रहता है ! इनका नाम है अध्यप्रशाद सिंह ! ये यहाँ अमेरिका में पिछले ४०-४५ सालों से हैं ! इनके तीन लड़कें हैं, बड़ा अशोक, दूसरा विजय और तीसरा अजय ! अध्य प्रशाद सिंह अजय-गीता के साथ ही रहते हैं ! विजय क्वींस में रहते हैं, इनका घर हनुमान मंदिर के नजदीक ही है ! विजय स्वयं मंदिर कमेटी के सदस्य हैं और इनका परिवार इनकी पत्नी, एक पुत्र और एक लड़की इस मंदिर के हर कार्य कर्मों में सहयोग देते हैं ! आज इनकी लड़की का जन्म दिन था और आज के भजन-कीर्तन, रामायण पठन-पाठन में अध्य प्रशाद्सिंह जी के परिवार का ही सबसे बड़ा योगदान था ! अजय अपनी कार में मुझे और मेरी पत्नी को मंदिर ले गए थे तथा घर भी इन्होने ही पहुंचाया ! अजय एक मिलनसार हंसमुख और हर किसी की मदद करने वाला तीन बच्चों का बाप है ! गीता इनकी पत्नी सहारनपुर की रहने वाली है ! अमेरिका में हिन्दुस्तान की सभ्यता और परम्पराओं को जीवित रखने वाला परिवार है यह !