Friday, February 5, 2010

भगवान इंसान से

एक दिन भगवान ने पूछा इंसान से,
क्यों तोड़ता है फूल तू और कलियों को मसलता,
देख सुन्दरता वनों की दिल तेरा क्यों मचलता,
इस गुलशन की महक को क्यों मिटाना चाहता है,
गुन गुनाते भंवरों को क्यों हटाना चाहता है।
क्यों काटता है पेड़ तू और पौधों को मिटाता,
प्रदूषण का जहर क्यों तू नदियों में है मिलाता ।
क्यों मिटाता जा रहा है कुदरत की शान को,
सोच ले कुछ देर तू तज अपने अभिमान को ।
मैंने बनायी थी धरा ये जीव जंगल के लिए,
और हर पर्वत शिखर पर थे टिमटिमाते दिए ,
तैने दिए क्यों बुझाए और पर्वत क्यों ढाये,
क्यों अपनी गन्दगी को उज्वल हिमालय पर गिराए?
कुदरत के नव रंग को तू बदरंग कर गया,
और गुलशन के चमन को विरान है तू कर गया !
अपने कुकर्मों के बोझ से अब तू क्यों बेचैन है,
दिन तो कभी का ढल चुका हो गयी अब रैन है ।
अब भी संभल कर काम कर ये धरा बच जाएगी,
नहीं तो सब मिट जाएगा जब प्रलय आ जाएगी ।

2 comments:

  1. prakirti ka jitna nuksan aaj vikas ke naam opar insan kar raha hai iski badi bhari kimat insan chuka raha hai aur abhi kitni kimat chukayega, sare jungal kate ja rahen hain briksh hare bhare kate ja rahe hain parwat dhaye ja rahe echological balance to buri tarah bigad raha iska sabse bada namuna jalwayu pariwartan hai agr isi raftar se ye pariwartan hote rahe to insan bemaut mara jayega abhi samay hai aye insan tu samhal ja aur apne ko barbad hone se bacha le, garib kya amir sare is prakirti ke kahar se bach nahi payenge, aap ne bahut achhi kawita likhi hai aapko bahut dhanyawad aur badhayi Rawatji.
    Dubey

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  2. बहुत ही अच्‍छी कविता लिखी है
    आपने काबिलेतारीफ बेहतरीन


    SANJAY KUMAR
    HARYANA
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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