Thursday, August 19, 2010

मेरी कहानी (चौबीसवां भाग)

बटालियन में
सेना से रिटायरमेंट के १५ साल बाद २० राजपूताना राईफल्स ने बटालियन के २१ वें रेजिंग डे पर बुलाया ! उस समय यूनिट जम्मू और पठानकोट के बीच में साम्भा में थी ! साम्भा एक छोटा सा रेलवे स्टेशन भी है, लेकिन यहाँ पर केवल पैसेंजर ट्रेन ही रुकती हैं, मेल एक्ष्प्रेस नहीं रुकती ! मैं अपनी पत्नी और द्योति नीतिका के साथ पहली जनवरी २००० को बटालियन के लिए चल पड़े ! दो जनवरी २००१ रात के एक बजे हम लोग जम्मू पहुंचे, वहां यूनिट की गाडी हमारे लिए खडी थी हमें सीधे यूनिट में ले गयी ! जब बटालियन रेज हुई थी पहली जनवरी १९८१ ई० को तो सबसे पहले यूनिट में ऐ एम ए देहरादून से कमीशन लेकर २/लेफ्टीनेंट आर पी जोशी साहेब आये थे ! आज वे बटालियन के कमांडिंग अधिकारी थे ! सूबेदार मेजर अमरसिंह जो शायद मेरे रिटायरमेंट के समय हवलदार रहे होंगे ! अगले दिन कार्यकर्म में शामिल हुए ! अच्छा इंतजाम था, दो दिन का व्यस्त कार्यकर्म था और तीसरे दिन हम लोग यूनिट की गाडी से वैष्णव देवी के दर्शन करने गए ! वैष्णव देवी के दर्शन करने का यह हमारा दूसरा अवसर था ! पहली बार सितम्बर १९९३ ई० में जब राजेश अमेरिका जा रहा था, उस वक्त गए थे ! कटरा तक बस और उसके बाद पैदल चढ़ाई, अर्ध कुंवारी और फिर सीधे हम लोग पहुंचे माँ के दरवार में ! १९९३ ई० में पठानकोट में मेरा चचेरा भाई मनोहरसिंह अपने परिवार के साथ रहता था ! एक रात उसके पास रहे थे ! उसी ने हमारे लिए विशेष पास का इंतजाम किया था ! उस समय भीड़ बहुत थी, लेकिन इस समय भीड़ भी कम थी और सारा इंतजाम यूनिट का था ! माँ के दर्शनों के बाद एक और चढ़ाई चढ़ कर हम लोग पहुंचे भैरों मंदिर ! पुराण कहते हैं जब माँ वैष्णव देवी ने भैरों को दंड देने के लिए उसका सर कलम किया तो उसने अपनी आखरी इच्छा बताई थी की "जो भी दर्शनार्थी आपके दर्शन करने आएं वे मेरे मंदिर में भी जरूर आएं और तभी उनकी यात्रा संपन्न समझी जाए" ! माँ ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली ! यूनिट के रेजिंग समारोह की समाप्ति पर हम लोग वापिस दिल्ली पहुंचे ! यूनिट ने मुझे फिर दुबारा बुलाया बटालियन रेजिंग डे पर पहली जनवरी २००६ में ! उस समय यूनिट फैजाबाद आ गयी थी जहां हम लोग बटालियन खडी होने के बाद पहली पोस्टिंग पर गए थे ! वही जामुन के और इमली के पेड़ ! अमरुद के बगीचे, गुप्तार घाट और सरयू नदी के किनारे बगीचे और वट वृक्षों की कतारें ! पुरानी यादें ताजी हो गयी थी ! पहली बार हम उस स्थान पर जौलाय सन १९८१ ई0 से नवम्बर १९८४ ई० तक रहे थे ! सिविल और फ़ौज का ये अंतर है की सिविल से अवकास लेने के बाद दुबारा कोई याद नहीं करता और सेना में रेजिमेंट की यूनिटें अपने सैनिकों को रिटायरमेंट के बाद भी हर साल पीस टाईम पर बुलाती हैं, पुरानी यादें ताजी करवाते हैं और मान सम्मान देते हैं ताकी वे उनके द्वारा की गयी सेवा के लिए गर्व महसूस करें !

1 comment:

  1. आज ही आपके ब्लॉग पर आया.. कहानी का २४ सवां भाग चल रहा है. ठीक है भाग १ से पढ़ना शुरू करता हूँ.

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