Thursday, July 15, 2010

मेरी कहानी (पांचवा भाग)

चीन ने "हिन्दी चीनी" भाई भाई का नारा लगाते हुए, १९६२ ई० में देश के पुर्वी हिसे पर आक्रमण कर दिया ! कुछ ही दिन पहले भारत के प्रधान मंत्री श्री जवाहर लाल नेहरू और चीन के प्रधान मंत्री श्री चाऊ इन लाई ने पंच शील समझौता पर हस्ताक्षर किये थे, और दोनों देशों के नेताओं ने शांती के सफ़ेद कबूतर भी उड़ाए थे, लेकिन कुछ ही समय के भीतर समझौते का उलंघन करते हुए अचानक भारतीय चौकियों पर चीन की सेना ने अटैक कर दिया ! भारतीय सेना तैयार नहीं थी ! पूर्वी सीमा पर हमारी पोस्टों पर सैनिकों की संख्या भी बहुत कम थी तथा पुराने हथियार थे, अम्युनिशन की भी कमी थी ! भारतीय सैनिक अपनी बहादूरी और रणकौशलत़ा के लिए विश्व में नंबर वन था पर जहां कायदे के हथियार न हों सही मैन पावर न हो, पहले तैयारी न हो और अचानक एक दोस्त पीठ पीछे से छुरा भोंक दे, तो फिर ऐसी हालत में बेचारा सैनिक क्या करेगा ! चीन ने वही हमारे साथ किया ! बहुत सारे सैनिक इस युद्ध में शहीद हुए, बहुत सारी हमारी भूमि पर चीनियों ने जबरन कब्जा कर दिया जो आज भी उनके अधिकार क्षेत्र में है ! सेना के कही बेस कीमती रत्न इस लड़ाई में खो गए, जिन में एक नाम आज भी हमारे रेजिमेंट का प्रेरणा स्रोत है , ब्रिगेडियर होशियार सिंह, जिन्होंने १०-12 चीनियों को मार कर आखरी शांस तक अपनी धरती शत्रु के कब्जे में नहीं जाने दी और वीर गति को प्राप्त होगये, भारतीय स्थल सेना के इतिहास में अपना नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा गए !
अब मैं १० वीं पास था तथा सेना में सेवारत था, तो रिश्ते आने लगे ! घर की माली हालत अच्छी नहीं थी, अभी संभालने में वक्त लगेगा ! उम्र भी २४ पार कर गया था ! अच्छे अच्छे घरों से भी रिश्ते आने लगे ! गनीमत है उस जमाने में कोई नहीं पूछता था की "वेतन भता कितना है ? ऊपर की कमाई कितनी है ?" अगर पूछता तो मैं क्या बताता की सब मिलाकर ८५ मिलते हैं ! हाँ खाना पीना और मकान सरकारी था ! उस समय ताम्बे के पैसे होते थे, इक्कनी, दो आना, ये पीतल के होते थे, चव्वनी, अट्ठानी और रुपया चांदी के होते थे ! चार पैसे का एक आना, १६ आने या ६४ पैसों का एक रुपया होता था ! एक रूपया का सिक्का भी होता था और नोट भी ! एक रुपये में काफी कुछ मिल जाता था ! उस जमाने में रुपये जेब में ले जाते थे और गाडी भर कर सामान लाते थे, आज की तरह नहीं की कार भर कर रुपये ले जाओ और जेब में सामान लाओ ! उस समय १०० रुपये का सबसे बड़ा नोट होता था जो किसी किसी के पास ही मिलता था ! १, २, ५, १० और १०० के नोट होते थे ! बाद में २० का चालू किया गया ! वाज में मन सेर छटांग प्रयोग में लाये जाते थे ! १६ छ्टांग का सेर होता था, ओर ४० ser का मन !
काफी खोज बीन के बाद तिमली में अवकास प्राप्त जंगलात विभाग के रेंजर साहेब श्री रणजीत सिंह गुसांई जी व श्रीमती कुन्दनी देवी की सुपुत्री जयन्ती देवी से ६ मार्च सन १९६० को मेरी शादी हुई ! यह परिवार हमारे परिवार से काफी आगे था ! मेरी पत्नी के बड़े भाई श्री जगमोहन सिंह जी गुसांई, जो उस समय खुद फौरेस्टर थे और शादीसुदा थे, मेरी पत्नी की भाभी का नाम सुमित्रादेवी है ! उनसे बड़ी बहिन प्रभा देवी हैं, उनकी शादी खितडिया के खुशालसिंह भंडारी के साथ हो चुका थी ! ! जब मेरी शादी हुई थी, फौरेस्टर साहेब के दो लड़कियां अरुणा और जान्हवी और एक लड़का विनोद हो चुका था ! बाद में अनूप, शोभा, सुषमी और सबसे छोटा बेटा प्रमोद हुआ ! गुसांई एक लड़ाकू राजपूत कौम है जो गढ़वाल राजा की सेना में ऊंचे ओहदों पर तैनात थे इनके ताऊ जी का लड़का रघुबीरसिंह भी आर्मी और्डीनेंस में कार्य रत थे ! तिमली गाँव डबराल्स्यूं पट्टी के आस पास के गावों से शिक्षित और धनाड्य था ! यहाँ गढ़वाल में एक मात्र संस्कृत पाठशाला थी जिसमें हिन्दी के साथ साथ मध्यमा तक संस्कृत की शिक्षा दी जाती थी और दूर दराज के ब्राह्मणों के लडके शिक्षा ग्रहण करने को आते थे ! आचार्य वाणीविलास जी जो उस जमाने के बड़े विद्वान धार्मिक शास्त्रों के ज्ञाता थे इसी गाँव के रहने वाले थे ! उन्होंने देवीखेत स्कूल के लिए अपने नाम से एक कमरा बनवा कर दिया था ! हरिद्वार में कही धर्म शालाओं में उनके नाम की तख्ती आज भी नजर आजाएगी ! उनके छोटे भाई विद्या दत्त जी भी संस्कृत और अंगरेजी के विद्वान थे ! ८ वीं क्लास में वे देवीखेत में हमारे अंगरेजी के अध्यापक थे ! उस समय मैं देहली कैंट में ही ५ वीं कंपनी में लिपिक की पोस्ट पर कार्यरत था ! जौलाय सन १९६१ ई० में मेरी पोस्टिंग जम्मू रणवीर सिंगपुरा (अंधेरी रख ) हो गयी थी ! कभी कभी पाकिस्तान की तरफ से सीमा पर गोला बारी हो जाया करती थी ! इस लिए एक दो महीने के लिए सीमा पर चले जाते थे बाकी समय शारीरिक ट्रेनिंग , परेड, खेल या फिर आर्मी के लिए बारीकें बन रही थी, कुछ सैनिक इस काम में मदद दे दिया करते थे ! सन १९६२ ई० में चीन ने अचानक हमला करके हमारे कही जवानों को मौत के घाट उतार दिया ! कहियों को बंदी बनाया गया ! हमारी सीमा के काफी अन्दर तक ये फरेबी धोखे बाज घुस आये थे ! इस विषम प्रस्थिति में भी हमारे एक शेर दिल जावाज ब्रिगेडियर होशियारसिंह भी वीरता से लड़ते हुए १०-1२ दुश्मनों को हलाक करके वीरगति को प्राप्त हुए ! उससे पहले वे राजपुताना राईफ्लस रेजिमेंटल सेंटर के कमांडेंट रह चुके थे ! आज भी राजपुताना राईफ्लस के व भारतीय स्थल सेना के इतिहास में उनका नाम स्वर्णा अक्षरों में लिखा हुआ है ! हमारी यूनिट को भी उस संग्राम में जाने का आदेश हो चुका था तैय्यारी भी हो चुकी थी, ठीक ऐन वक्त पर सीज फायर होगया और हमारी यूनिट का प्रोग्राम कैंसिल हो गया ! सन १९६३ जौलाय के महीने में हमारी यूनिट थ्री राजपुताना राईफ्लस (गॉड्स औन ) पूंछ सेक्टर चली गयी ! यहाँ जहां हमारा मुख्यालय था यह स्थान कभी पूंछ महाराजा का महल था ! ( छटा भाग )

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